मध्यप्रदेश के हजारों शासकीय कर्मचारियों के लिए जबलपुर हाईकोर्ट का फैसला राहत लेकर आया है। कोर्ट ने प्रोबेशन अवधि के दौरान कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का केवल 70%, 80% और 90% भुगतान करने की व्यवस्था को निरस्त कर दिया है।कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने 8 सितंबर 2026 को समान मुद्दे से जुड़ी कई रिट याचिकाओं पर साझा आदेश पारित किया।कोर्ट ने निर्देश दिया कि 25 नवंबर 2019 के बाद नियुक्त संबंधित शासकीय कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि में उनके द्वारा किए गए कार्य का पूरा वेतन दिया जाए।
पहले तीन साल 70%, 80% और 90% मिलता था वेतन
राज्य सरकार की व्यवस्था के तहत प्रोबेशन के दौरान कर्मचारियों को पहले तीन वर्षों में पूरा वेतन नहीं दिया जाता था।
पहला साल: न्यूनतम वेतनमान का 70%
दूसरा साल: न्यूनतम वेतनमान का 80%
तीसरा साल: न्यूनतम वेतनमान का 90%
हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था से जुड़े नियमों और सर्कुलर को निरस्त कर दिया है।
पूरा काम तो पूरा वेतन क्यों नहीं?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कर्मचारी निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के तहत चयनित होकर संबंधित पद पर नियुक्त होता है। प्रोबेशन अवधि में भी उससे उसके पद के अनुरूप काम लिया जाता है।ऐसे में केवल इस आधार पर कि कर्मचारी अभी प्रोबेशन पर है, उसे नियमित वेतनमान से कम भुगतान करना उचित नहीं माना जा सकता।कोर्ट ने यह भी माना कि निर्धारित पद के अनुरूप पूरा काम लेने के बावजूद कम वेतन देने का कोई ठोस आधार नहीं है।
21 कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती
यह मामला स्वास्थ्य विभाग में पदस्थ 21 कर्मचारियों की याचिका से जुड़ा है। इन कर्मचारियों ने राज्य सरकार की प्रोबेशन के दौरान कम वेतन देने वाली व्यवस्था को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।मामला हेमंत हेलोंडे एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश शासन से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अंशुल तिवारी और अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने पैरवी की।
कक्षा-III और कक्षा-IV कर्मचारियों के मामले में भी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को कक्षा-III और कक्षा-IV कर्मचारियों के प्रति भेदभावपूर्ण भी माना।कोर्ट के मुताबिक भर्ती नियमों में जिस पद के लिए जिस पे-स्केल का प्रावधान किया गया है, कर्मचारी उसी के अनुसार वेतन पाने का हकदार है। सिर्फ प्रोबेशन अवधि में होने के कारण उसके वेतन में कटौती नहीं की जा सकती।
10%, 20% और 30% रोकी गई राशि का क्या होगा?
प्रोबेशन व्यवस्था के दौरान पहले तीन वर्षों में कर्मचारियों को क्रमशः 30%, 20% और 10% कम भुगतान किया जाता था।यानी पहले वर्ष में 70% वेतन मिलने के कारण 30%, दूसरे वर्ष में 80% मिलने पर 20% और तीसरे वर्ष में 90% मिलने पर 10% राशि का अंतर रहता था।याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सरकार की ऐसी कोई नीति नहीं थी, जिसके तहत प्रोबेशन पूरा होने के बाद इन वर्षों में रोकी गई राशि को एरियर के रूप में दिया जाए।अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद संबंधित कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि में किए गए कार्य का पूरा वेतन देने के निर्देश दिए गए हैं।
स्टाइपेंड बताकर कम भुगतान करने का भी आधार नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान यह तर्क भी रखा गया कि 70%, 80% और 90% भुगतान को स्टाइपेंड के रूप में देने का कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान नहीं है।कोर्ट के समक्ष कहा गया कि भर्ती नियमों में निर्धारित पे-स्केल से कम वेतन केवल किसी वैध कार्रवाई या निर्धारित सजा के तहत ही किया जा सकता है। सामान्य परिस्थितियों में बिना ठोस कानूनी आधार के वेतन में कटौती नहीं की जा सकती।
सजा के नाम पर भी मनमानी कटौती नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को दंडित करने के नाम पर उसका पे-स्केल मनमाने तरीके से न्यूनतम वेतनमान से नीचे नहीं किया जा सकता।नियमों के तहत इंक्रीमेंट रोका जा सकता है या कर्मचारी को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निचले पे-स्केल पर वापस भेजा जा सकता है, लेकिन सजा के नाम पर मनमाने ढंग से वेतनमान कम करने की व्यवस्था नहीं हो सकती।
25 नवंबर 2019 का मेमो भी निरस्त
हाईकोर्ट ने 25 नवंबर 2019 के मेमो (एनेक्शर R-4) के जरिए लागू की गई संबंधित व्यवस्था को भी निरस्त कर दिया।कोर्ट ने इस व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 12 और 14 के विपरीत माना। इस सर्कुलर के आधार पर संबंधित विभागों द्वारा किए गए संशोधनों को भी निरस्त कर दिया गया है।
किन कर्मचारियों पर पड़ेगा सीधा असर?
इस फैसले का सीधा असर उन संबंधित शासकीय कर्मचारियों पर पड़ेगा, जिन्हें 25 नवंबर 2019 के बाद नियुक्त किया गया था और प्रोबेशन अवधि के दौरान 70%, 80% और 90% न्यूनतम वेतनमान के आधार पर भुगतान किया गया।फैसले के बाद ऐसे कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि में किए गए काम के लिए निर्धारित वेतनमान के अनुसार पूरा वेतन दिए जाने का रास्ता साफ हुआ है।