भारतीय सिनेमा का इतिहास अनेक ऐसी विभूतियों से समृद्ध है, जिन्होंने अपने समय से आगे बढ़कर नई परंपराएं स्थापित कीं। मूक फिल्मों से लेकर सवाक फिल्मों तक के संक्रमण काल में कुछ कलाकारों ने अभिनय की ऐसी मिसाल पेश की, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। इन्हीं अग्रणी हस्तियों में देविका रानी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें केवल एक सफल अभिनेत्री ही नहीं, बल्कि भारतीय फिल्म उद्योग की पहली महिला सुपरस्टार, ‘फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन सिनेमा’ और हिंदी सिनेमा की पहली ‘ड्रीम गर्ल’ के रूप में भी याद किया जाता है। उनकी प्रतिभा, व्यक्तित्व और दूरदर्शी सोच ने उन्हें अपने समकालीन कलाकारों से अलग पहचान दिलाई।
आधुनिक सोच और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा ने बनाया विशिष्ट व्यक्तित्व
देविका रानी का व्यक्तित्व अपने समय से काफी आगे माना जाता था। उन्होंने इंग्लैंड में कला और डिज़ाइन का अध्ययन किया था, जिसका प्रभाव उनके अभिनय, पहनावे, संवाद शैली और फिल्म निर्माण की दृष्टि में स्पष्ट दिखाई देता था। भारत लौटने के बाद उनकी मुलाकात प्रसिद्ध फिल्म निर्माता हिमांशु रॉय से हुई, जिनके साथ उन्होंने न केवल अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत की, बल्कि बाद में विवाह भी किया। दोनों ने मिलकर ‘बॉम्बे टॉकीज’ की स्थापना की, जिसने भारतीय फिल्म उद्योग को पेशेवर ढांचा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस बैनर तले बनी अनेक फिल्मों ने हिंदी सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और कई बड़े कलाकारों के करियर की नींव रखी।
‘कर्मा’ फिल्म और चर्चित चुंबन दृश्य ने बदली सामाजिक बहस
देविका रानी ने उस दौर में ऐसे विषयों और दृश्यों पर काम करने का साहस दिखाया, जिन्हें समाज सहज रूप से स्वीकार नहीं करता था। वर्ष 1933 में प्रदर्शित फिल्म ‘कर्मा’ में उन्होंने अपने सह-कलाकार हिमांशु रॉय के साथ लंबा चुंबन दृश्य दिया, जिसने तत्कालीन समाज में व्यापक चर्चा और विवाद को जन्म दिया। उस समय भारतीय फिल्मों में इस प्रकार का दृश्य अभूतपूर्व माना जाता था, जिसके कारण उन्हें आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। हालांकि, फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि यह साहस उनके पेशेवर दृष्टिकोण और कला के प्रति समर्पण का परिचायक था। इसी फिल्म की एक और विशेषता यह रही कि इसमें अंग्रेज़ी संवादों का भी व्यापक प्रयोग किया गया, जिससे यह अपने समय की विशिष्ट फिल्मों में शामिल हो गई।
‘अछूत कन्या’ ने दिलाया अमर सम्मान और राष्ट्रीय पहचान
वर्ष 1936 में प्रदर्शित फिल्म ‘अछूत कन्या’ देविका रानी के अभिनय जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है। सामाजिक कुरीतियों और जातिगत भेदभाव जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित इस फिल्म में उनके प्रभावशाली अभिनय ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों को गहराई से प्रभावित किया। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के सामाजिक यथार्थवादी दौर की महत्वपूर्ण कृतियों में गिनी जाती है। देविका रानी की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि उन्हें भारतीय सिनेमा की पहली ‘ड्रीम गर्ल’ कहा जाने लगा। यही कारण है कि बाद के दशकों में हेमा मालिनी को ‘ड्रीम गर्ल’ के रूप में मिली लोकप्रिय उपाधि से पहले यह सम्मान देविका रानी के नाम से जुड़ा हुआ था।
देश के प्रथम प्रधानमंत्री भी थे उनकी प्रतिभा के प्रशंसक
देविका रानी का प्रभाव केवल फिल्म जगत तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के अनेक प्रमुख बुद्धिजीवी और राष्ट्रीय नेता भी उनकी प्रतिभा से प्रभावित थे। विभिन्न ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू के आग्रह पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फिल्म ‘अछूत कन्या’ देखी थी। फिल्म में देविका रानी के अभिनय से प्रभावित होकर उन्होंने उनके नाम एक प्रशंसात्मक पत्र भी लिखा था। यह घटना उस दौर में उनकी प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक प्रभाव का महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है। भारतीय सिनेमा के विकास में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें बाद में देश के सर्वोच्च फिल्म सम्मान ‘दादासाहेब फाल्के पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया, जिससे उनका नाम भारतीय चलचित्र इतिहास में सदा के लिए स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया।