विटामिन बी12 शरीर के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्वों में शामिल है, लेकिन इसे पर्याप्त मात्रा में हासिल करना खासतौर पर पूरी तरह शाकाहारी और वीगन आहार लेने वाले लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सामान्य स्पिरुलिना को लंबे समय से पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ माना जाता रहा है, लेकिन इसके बी12 को लेकर एक बड़ी समस्या रही है। पहले के अध्ययनों में पाया गया है कि सामान्य स्पिरुलिना में मौजूद बी12 का बड़ा हिस्सा ऐसा रूप होता है जिसे मानव शरीर प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं कर पाता। अब नए अध्ययन ने इसी समस्या को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शोधकर्ताओं ने नियंत्रित प्रकाश व्यवस्था के जरिए स्पिरुलिना में जैविक रूप से सक्रिय बी12 की मात्रा बढ़ाने का तरीका विकसित किया है।
सामान्य स्पिरुलिना से क्यों अलग है यह खोज
नई खोज को समझने के लिए सामान्य स्पिरुलिना और अध्ययन में तैयार की गई विशेष स्पिरुलिना के बीच अंतर जानना जरूरी है। वैज्ञानिकों ने आर्थ्रोस्पाइरा प्लाटेंसिस यानी स्पिरुलिना को विशेष प्रकाश-नियंत्रित वातावरण में उगाया। इस प्रक्रिया में प्रकाश की परिस्थितियों को इस तरह नियंत्रित किया गया कि शैवाल के प्राकृतिक जैविक मार्ग सक्रिय होकर बी12 के सक्रिय रूप के उत्पादन को बढ़ावा दे सकें। महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने इसके लिए आनुवंशिक बदलाव का सहारा नहीं लिया। अध्ययन में तैयार इस विशेष जैवभार को प्रकाश-संश्लेषण नियंत्रित स्पिरुलिना कहा गया है और इसके नमूनों में सक्रिय बी12 का अनुपात 98% से अधिक पाया गया।
सक्रिय बी12 और सामान्य स्पिरुलिना में क्या है अंतर
विटामिन बी12 के मामले में केवल उसकी कुल मात्रा देखना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि उसमें मौजूद बी12 का कौन-सा रूप शरीर के लिए उपयोगी है। सामान्य स्पिरुलिना में लंबे समय से तथाकथित छद्म-विटामिन बी12 की मौजूदगी की समस्या सामने आती रही है। यह संरचना में बी12 जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन मानव शरीर के लिए वास्तविक बी12 की तरह काम नहीं करता। पुराने शोध में भी स्पिरुलिना उत्पादों में ऐसे निष्क्रिय रूपों की अधिकता पाई गई थी, जिसके कारण इसे बी12 का भरोसेमंद स्रोत नहीं माना गया। नए अध्ययन की खासियत यही है कि नियंत्रित प्रकाश तकनीक से तैयार स्पिरुलिना में सक्रिय बी12 प्रमुख रूप में मिला।
गोमांस के करीब मिली सक्रिय बी12 की मात्रा
अध्ययन के अनुसार, विशेष परिस्थितियों में तैयार की गई स्पिरुलिना में सक्रिय बी12 की मात्रा लगभग 1.64 माइक्रोग्राम प्रति 100 ग्राम पाई गई। शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना गोमांस से की, जिसमें बी12 की मात्रा लगभग 0.7 से 1.5 माइक्रोग्राम प्रति 100 ग्राम बताई गई है। यानी प्रयोग में तैयार स्पिरुलिना का सक्रिय बी12 स्तर गोमांस के बराबर या थोड़ा अधिक पाया गया। यह तुलना इस खोज को खास बनाती है, क्योंकि स्पिरुलिना में इतनी मात्रा में जैविक रूप से सक्रिय बी12 मिलने की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि बाजार में मिलने वाली हर स्पिरुलिना में इतनी ही मात्रा में सक्रिय बी12 मौजूद होगा।
शरीर के लिए विटामिन बी12 इतना जरूरी क्यों है
विटामिन बी12 शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण, तंत्रिका तंत्र के सामान्य कामकाज और डीएनए के निर्माण जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। इसकी गंभीर कमी से रक्ताल्पता और तंत्रिका संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। हाथ-पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन जैसी शिकायतें भी बी12 की कमी से जुड़ी हो सकती हैं। लंबे समय तक कमी रहने पर समस्या अधिक गंभीर रूप ले सकती है, इसलिए केवल थकान या कमजोरी जैसे सामान्य लक्षणों के आधार पर स्वयं बी12 की कमी मान लेना उचित नहीं है। आवश्यकता होने पर रक्त जांच और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर ही इसकी कमी की पुष्टि की जानी चाहिए।
शाकाहारियों और वीगन लोगों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है खोज
विटामिन बी12 के प्रमुख प्राकृतिक आहार स्रोत पारंपरिक रूप से पशु-आधारित खाद्य पदार्थ रहे हैं, जबकि पूरी तरह पौध-आधारित आहार लेने वालों के लिए इसकी पर्याप्त मात्रा हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यही कारण है कि शाकाहारी और विशेष रूप से वीगन आहार लेने वाले लोगों में बी12 की पर्याप्तता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यदि प्रकाश-नियंत्रित तरीके से तैयार की गई स्पिरुलिना को आगे के मानव परीक्षणों में सुरक्षित और प्रभावी बी12 स्रोत साबित किया जाता है, तो भविष्य में इसे खाद्य पदार्थों के पोषण संवर्धन या पोषण संबंधी उत्पादों में इस्तेमाल करने की संभावना बन सकती है। हालांकि, अभी इसे स्थापित उपचार या बी12 की गोलियों का सीधा विकल्प कहना जल्दबाजी होगी।
केवल 100 ग्राम स्पिरुलिना खाना नहीं होगा व्यावहारिक समाधान
शोधकर्ताओं ने इस बात पर भी सावधानी जताई है कि प्रयोग में प्राप्त बी12 स्तर को देखते हुए प्रतिदिन बड़ी मात्रा में ऐसी स्पिरुलिना खाना व्यावहारिक समाधान नहीं माना जा सकता। 100 ग्राम स्पिरुलिना रोजाना खाना स्वाद, बनावट और पोषण संतुलन जैसी कई समस्याएं पैदा कर सकता है। इसके अलावा अधिक मात्रा में सेवन करने पर कुछ अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत से ज्यादा मात्रा मिलने का जोखिम भी हो सकता है। इसलिए भविष्य में इस सामग्री को सीधे बड़ी मात्रा में खाने के बजाय दूसरे खाद्य पदार्थों में नियंत्रित मात्रा में मिलाने या खाद्य संवर्धन के माध्यम से इस्तेमाल करने की संभावना अधिक व्यावहारिक हो सकती है। शोधकर्ताओं ने भी बड़े पैमाने पर उपयोग से पहले उत्पाद विकास और पोषण संबंधी परीक्षणों की आवश्यकता बताई है।
पर्यावरण के लिहाज से भी उम्मीद जगाती है तकनीक
इस शोध की दिलचस्पी केवल बी12 उत्पादन तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों ने जिस नियंत्रित प्रकाश आधारित प्रणाली का इस्तेमाल किया, उसमें कम भूमि और पानी के उपयोग के साथ स्पिरुलिना उत्पादन की संभावना पर भी जोर दिया गया है। यदि ऐसी प्रणालियां नवीकरणीय ऊर्जा के साथ संचालित की जाएं तो इनके पर्यावरणीय प्रभाव को कम रखने की संभावना हो सकती है। यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने इसे पशु-आधारित खाद्य स्रोतों के मुकाबले अधिक टिकाऊ पोषण विकल्प के रूप में आगे विकसित करने की संभावना पर चर्चा की है। हालांकि, बड़े पैमाने पर उत्पादन की वास्तविक पर्यावरणीय लागत और लाभ का आकलन अलग-अलग परिस्थितियों में विस्तृत अध्ययन के बाद ही किया जा सकेगा।
अभी सबसे जरूरी हैं मनुष्यों पर परीक्षण
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मौजूदा अध्ययन को अंतिम चिकित्सकीय प्रमाण नहीं माना जा सकता। शोध मुख्य रूप से नियंत्रित परिस्थितियों में स्पिरुलिना के उत्पादन और उसके बी12 स्वरूप के विश्लेषण पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने आगे मनुष्यों पर किए जाने वाले परीक्षणों की जरूरत बताई है, ताकि यह पता चल सके कि इस स्पिरुलिना से मिलने वाला सक्रिय बी12 मानव शरीर में कितनी प्रभावी तरह अवशोषित और उपयोग होता है। इसलिए फिलहाल इस खोज को भविष्य की संभावित बी12 आपूर्ति के लिए आशाजनक वैज्ञानिक विकास के रूप में देखना उचित होगा, न कि बी12 की कमी का तत्काल समाधान मानना।
बाजार में मिलने वाली सामान्य स्पिरुलिना को लेकर न करें जल्दबाजी
इस शोध के सामने आने के बाद बाजार में मिलने वाली सामान्य स्पिरुलिना को सीधे बी12 की कमी दूर करने वाला खाद्य पदार्थ मान लेना सही नहीं होगा। इस अध्ययन में जिस सक्रिय बी12 की बात की गई है, वह विशेष प्रकाश-नियंत्रित उत्पादन प्रक्रिया से तैयार की गई स्पिरुलिना में मिला है। इसलिए केवल किसी उत्पाद के पैकेट पर लिखी बी12 की कुल मात्रा देखकर उसके स्वास्थ्य लाभ के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। बी12 की कमी का संदेह होने पर चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञ की सलाह अधिक विश्वसनीय रास्ता है। विशेष रूप से जिन लोगों में पहले से बी12 की कमी पाई गई है, उन्हें अपनी निर्धारित दवा या पोषण पूरक को बिना चिकित्सकीय सलाह के बंद नहीं करना चाहिए।
भविष्य में बदल सकता है पौध-आधारित पोषण का नजरिया
नई खोज सफलतापूर्वक आगे बढ़ती है तो इसका महत्व केवल बी12 की कमी तक सीमित नहीं रहेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसी स्पिरुलिना को भविष्य में पोषण पूरक, खाद्य संवर्धन और पौध-आधारित खाद्य पदार्थों में शामिल करने की संभावना तलाश की जा सकती है। इससे उन लोगों के लिए विकल्प बढ़ सकते हैं जो पशु-आधारित खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना चाहते हैं। लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए मानव परीक्षण, बी12 की जैवउपलब्धता, लंबे समय तक सेवन की सुरक्षा, स्वाद और खाद्य उत्पादों में इसके उपयोग जैसे कई सवालों के जवाब तलाशने होंगे। फिलहाल वैज्ञानिकों की यह खोज एक संभावित नए रास्ते की शुरुआत जरूर करती है, लेकिन इसे व्यापक स्वास्थ्य समाधान बनने में अभी समय लगेगा।