नई दिल्ली। जन्माष्टमी का त्योहार आते ही भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की यादें ताजा हो जाती हैं। कान्हा की नटखट शरारतें, गोपियों के घर से माखन चुराना और अपने सखाओं के साथ मिलकर मटकी फोड़ना आज भी भक्तों के बीच बेहद लोकप्रिय है। इन्हीं बाल लीलाओं से जुड़ी है दही हांडी की परंपरा, जिसे जन्माष्टमी के अगले दिन बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है।
श्रीकृष्ण को बेहद पसंद था माखन-दही
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाल गोपाल को माखन और दही बेहद प्रिय था। बचपन में श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ गोकुल की गलियों में घूमते थे। जिस घर में उन्हें माखन-दही की मटकी नजर आती, वे मौका पाकर उसे चुरा लेते थे। कान्हा की इन शरारतों से गोपियां काफी परेशान रहती थीं। इसके बाद उन्होंने माखन-दही को कृष्ण से बचाने के लिए मटकी को जमीन से काफी ऊंचाई पर लटकाना शुरू कर दिया।
दोस्तों के साथ बनाते थे मानव पिरामिड
गोपियों ने सोचा कि ऊंचाई पर टंगी मटकी तक कान्हा नहीं पहुंच पाएंगे, लेकिन श्रीकृष्ण भी कहां हार मानने वाले थे। वे अपने सखाओं को इकट्ठा करते और सभी मिलकर एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर मानव पिरामिड बनाते थे।
पिरामिड के सबसे ऊपर पहुंचने वाला साथी मटकी तक पहुंचता और उसे फोड़ देता। इसके बाद सभी मिलकर माखन और दही का आनंद लेते थे। यही बाल लीला आगे चलकर दही हांडी उत्सव की परंपरा का आधार बनी।
कैसे मनाया जाता है दही हांडी उत्सव?
दही हांडी के दौरान एक मटकी में दही, मक्खन और अन्य सामग्री भरकर उसे रस्सी के सहारे काफी ऊंचाई पर बांधा जाता है। इसके बाद युवाओं की टोली, जिसे आमतौर पर गोविंदा कहा जाता है, एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर मानव पिरामिड बनाती है।
सबसे ऊपर पहुंचने वाला गोविंदा आखिर में मटकी फोड़ता है। मटकी टूटते ही दही और दूसरी सामग्री नीचे गिरती है और पूरा माहौल भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों, ढोल-नगाड़ों और भजनों से गूंज उठता है।
महाराष्ट्र में खास है दही हांडी का उत्सव
दही हांडी का सबसे भव्य आयोजन महाराष्ट्र में देखने को मिलता है। यहां काफी ऊंचाई पर दही हांडी बांधी जाती है और इसे तोड़ने के लिए अलग-अलग गोविंदा टोलियां हिस्सा लेती हैं। कई जगह मटकी फोड़ने वाली टीम के लिए बड़े इनाम भी रखे जाते हैं।
हालांकि अब दही हांडी सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। देश के कई राज्यों में जन्माष्टमी के अगले दिन इस उत्सव को धूमधाम से मनाया जाता है।
दही हांडी सिर्फ खेल नहीं, कृष्ण की बाल लीला का प्रतीक
दही हांडी में केवल मटकी फोड़ने की प्रतियोगिता नहीं होती, बल्कि यह भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और उनके सखाओं के साथ प्रेम का प्रतीक भी मानी जाती है। गोविंदा टोलियों में मिलकर मटकी फोड़ते हैं, जो एकता, सहयोग और सामूहिक प्रयास का संदेश देती है। इसी वजह से जन्माष्टमी के बाद दही हांडी का उत्सव भक्तों और युवाओं के बीच खास आकर्षण का केंद्र बना रहता है।