नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का एक साथ होना वैश्विक कूटनीति की महत्वपूर्ण तस्वीर बनकर उभरा है। तीनों नेताओं के सामने अपने-अपने राष्ट्रीय हित और अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं, लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने उन्हें एक साझा मंच पर संवाद का अवसर दिया है। शी जिनपिंग करीब 7 वर्ष बाद भारत आए हैं, जबकि पुतिन यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के बाहर एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह पश्चिम के साथ अपने संबंधों को मजबूत रखते हुए रूस और चीन के साथ भी रणनीतिक संवाद बनाए रखे।
तियानजिन की मुलाकात के बाद बढ़ी उत्सुकता
नई दिल्ली में होने वाली यह त्रिपक्षीय तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे पहले तीनों नेताओं की चर्चित मुलाकात तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। अब ब्रिक्स के विस्तारित मंच पर उनकी मौजूदगी ऐसे समय में है, जब संगठन पहले की तुलना में अधिक बड़ा और अधिक विविध हो चुका है। समूह के भीतर आर्थिक हितों, राजनीतिक दृष्टिकोणों और विदेश नीति की प्राथमिकताओं में काफी अंतर है। ऐसे में केवल शीर्ष नेताओं की एक साथ मौजूदगी अपने आप में किसी नए गठबंधन की घोषणा नहीं करती, लेकिन यह जरूर दिखाती है कि वैश्विक राजनीति में संवाद के लिए पश्चिम से इतर मंचों का महत्व बढ़ रहा है।
ब्रिक्स का विस्तार बना ताकत भी और चुनौती भी
ब्रिक्स की शुरुआत 2001 में अर्थशास्त्री जिम ओ'नील द्वारा गढ़े गए एक आर्थिक संक्षिप्त नाम के रूप में हुई थी, लेकिन बाद में यह राजनीतिक और आर्थिक सहयोग के महत्वपूर्ण मंच में बदल गया। ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ 2009 में इसकी औपचारिक राजनीतिक यात्रा शुरू हुई और दक्षिण अफ्रीका 2011 में इसमें शामिल हुआ। इसके बाद मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात 2024 में तथा इंडोनेशिया 2025 में समूह का हिस्सा बने। सऊदी अरब की स्थिति कुछ अलग है, क्योंकि उसे ब्रिक्स के विस्तारित सदस्यों में शामिल किया जाता है, लेकिन रियाद ने औपचारिक सदस्यता की पुष्टि को लेकर अब तक सावधानी बरती है।
आंकड़ों में ब्रिक्स की बढ़ती ताकत
विस्तारित ब्रिक्स का आर्थिक और जनसांख्यिकीय प्रभाव इसे वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शक्ति बनाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार समूह के सदस्य देश दुनिया की करीब 49% आबादी, लगभग 39% वैश्विक GDP और करीब 23% अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसकी सदस्यता एशिया की बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं से लेकर खाड़ी के ऊर्जा उत्पादक देशों और अफ्रीका की उभरती अर्थव्यवस्थाओं तक फैली हुई है। ईरान की मौजूदगी इसे पश्चिम एशिया के रणनीतिक समीकरणों से भी जोड़ती है। इस विविधता से ब्रिक्स का प्रभाव बढ़ता है, लेकिन यही विविधता उसके भीतर साझा नीति पर सहमति बनाना कठिन भी करती है।
भारत के लिए संतुलन साधना सबसे बड़ी चुनौती
भारत की स्थिति इस पूरे समीकरण में सबसे अलग और महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली एक ओर अमेरिका तथा यूरोप के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ा रही है, वहीं रूस के साथ उसके पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध हैं। दूसरी ओर चीन भारत का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार होने के साथ सीमा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख पक्ष भी है। इसलिए भारत ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन में बदलने के बजाय बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के मंच के रूप में देखना चाहता है। मोदी के लिए इस मंच की सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच संवाद और सहयोग की गुंजाइश कितनी बढ़ा पाता है।
पश्चिमी दबाव के बीच ब्रिक्स की भूमिका पर नजर
अमेरिकी व्यापार नीतियों में अनिश्चितता और रूस पर जारी पश्चिमी प्रतिबंधों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। इसी पृष्ठभूमि में ब्रिक्स के भीतर आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वित्तीय संस्थाओं और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को अधिक महत्व मिल रहा है। हालांकि सदस्य देशों के बीच मतभेद इतने व्यापक हैं कि किसी एक साझा रणनीति पर पहुंचना आसान नहीं होगा। चीन की आर्थिक ताकत, रूस की सुरक्षा प्राथमिकताएं, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और खाड़ी देशों के ऊर्जा हित एक-दूसरे से पूरी तरह समान नहीं हैं। इसलिए ब्रिक्स का प्रभाव उसके आकार से जितना बढ़ता है, उतनी ही उसकी निर्णय क्षमता की परीक्षा भी होती है।
क्या तीनों नेताओं की तस्वीर बदल देगी विश्व व्यवस्था?
मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग का एक साथ खड़ा होना निश्चित रूप से वैश्विक राजनीति के लिए प्रतीकात्मक रूप से शक्तिशाली दृश्य है, लेकिन विश्व व्यवस्था में वास्तविक बदलाव केवल तस्वीरों से नहीं आता। इसके लिए व्यापार, निवेश, ऊर्जा, वित्त, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सुधार जैसे क्षेत्रों में ठोस सहयोग की जरूरत होगी। यदि ब्रिक्स अपने मतभेदों के बावजूद साझा आर्थिक और कूटनीतिक एजेंडा लागू करने में सफल होता है तो वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज मजबूत हो सकती है। लेकिन यदि सदस्य देश केवल अपने-अपने हितों तक सीमित रहे, तो यह ऐतिहासिक तस्वीर प्रभावशाली जरूर होगी, पर इसके दूरगामी भू-राजनीतिक परिणाम सीमित रह सकते हैं।