ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में मौजूद आतंकवादी ढांचे को बड़ा नुकसान पहुंचा था। भारत ने उन ठिकानों को निशाना बनाया था, जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों की योजना और संचालन के लिए किया जाता था। इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठनों पर दबाव बढ़ा और उनके स्थापित ढांचे को गंभीर चुनौती मिली। अब सामने आ रहे सुरक्षा इनपुट संकेत देते हैं कि पाकिस्तान अपने पुराने तौर-तरीकों पर लौटने के बजाय आतंक के नेटवर्क को नए तरीके से खड़ा करने की कोशिश कर रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस बार बड़े और आसानी से पहचाने जाने वाले आतंकी प्रशिक्षण शिविरों के बजाय छोटे और बिखरे हुए नेटवर्क तैयार करने की रणनीति अपनाई जा सकती है। ऐसे नेटवर्क का उद्देश्य आतंकियों को अलग-अलग स्थानों पर सक्रिय रखना और सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी से बचाना हो सकता है। खुफिया सूचनाओं में जम्मू-कश्मीर को लेकर संभावित साजिश की बात सामने आने के बाद सुरक्षा व्यवस्था को और सतर्क किया गया है। हालांकि किसी भी संभावित हमले की सटीक प्रकृति या समय को लेकर अंतिम निष्कर्ष केवल जांच और खुफिया आकलन के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
आतंक के पुराने ढांचे को लगा था बड़ा झटका
ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान में मौजूद भारत विरोधी आतंकी ढांचे को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया था। जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-ताइबा जैसे संगठनों से जुड़े ठिकानों पर हुई कार्रवाई ने यह दिखाया कि भारत सीमा पार से संचालित आतंकवादी ढांचे के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने की क्षमता और इच्छाशक्ति रखता है। लंबे समय से जम्मू-कश्मीर में हिंसा को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नेटवर्क पर इस कार्रवाई का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ा। पाकिस्तान के लिए चुनौती यह बन गई कि पुराने ढांचे को उसी स्वरूप में दोबारा खड़ा करना पहले की तुलना में कहीं अधिक जोखिम भरा हो गया है।
इसी वजह से अब छोटे नेटवर्क और सीमित स्तर पर संचालित मॉड्यूल की रणनीति को अधिक सुरक्षित विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है। यदि आतंकी नेटवर्क को कई छोटे हिस्सों में बांटा जाता है तो एक हिस्से के पकड़े जाने पर दूसरे हिस्सों के बारे में जानकारी हासिल करना अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है। इस तरह की रणनीति सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक अलग चुनौती पेश करती है, क्योंकि इसमें किसी एक बड़े ठिकाने के बजाय कई छोटे संपर्कों, स्थानीय मददगारों, वित्तीय स्रोतों और संचार माध्यमों की निगरानी आवश्यक हो जाती है।
छोटे मॉड्यूल के जरिए नेटवर्क खड़ा करने की कोशिश
सुरक्षा आकलनों के मुताबिक पाकिस्तान समर्थित नेटवर्क छोटे-छोटे मॉड्यूल के जरिए जम्मू-कश्मीर में अपनी गतिविधियों को दोबारा सक्रिय करने का प्रयास कर सकता है। ऐसे मॉड्यूल का इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर संपर्क स्थापित करने, सूचनाएं जुटाने और आतंकियों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने के लिए किए जाने की आशंका रहती है। बड़े कैंपों के विपरीत छोटे नेटवर्क अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं और अलग-अलग स्थानों पर फैले होने के कारण उन्हें पहचानना सुरक्षा एजेंसियों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इस संभावित रणनीति में आतंकियों को प्रशिक्षण, हथियार, धन और अन्य सहायता अलग-अलग चैनलों के माध्यम से उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा सकता है। इसका उद्देश्य किसी एक केंद्रीकृत ढांचे पर निर्भरता कम करना हो सकता है। सुरक्षा एजेंसियों के लिए इसलिए केवल सीमा पर निगरानी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि आतंकी वित्तपोषण, संदिग्ध संपर्कों, हथियारों की आवाजाही और स्थानीय स्तर पर बनने वाले नेटवर्क पर भी लगातार नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और खुफिया तंत्र के बीच समन्वय को विशेष महत्व दिया जा रहा है।
नवंबर-दिसंबर में बढ़ सकती है चुनौती
खुफिया इनपुट में नवंबर और दिसंबर के दौरान जम्मू-कश्मीर में किसी बड़ी आतंकी गतिविधि की आशंका जताई गई है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान समर्थित नेटवर्क इससे पहले अपने संभावित मॉड्यूल को सक्रिय करने की कोशिश कर सकता है। सुरक्षा एजेंसियों के आकलन में इस तरह की किसी साजिश का उद्देश्य केवल हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि आतंकवादी संगठनों का मनोबल बढ़ाना और ऑपरेशन सिंदूर के बाद उनके कमजोर पड़े नेटवर्क को दोबारा सक्रिय होने का संदेश देना भी हो सकता है।
संभावित खतरे को देखते हुए आने वाले महीनों को सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माना जा रहा है। हालांकि किसी खुफिया इनपुट को वास्तविक हमले का निश्चित संकेत नहीं माना जा सकता, लेकिन ऐसी सूचनाओं के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था को पहले से मजबूत करना जरूरी होता है। जम्मू-कश्मीर में संवेदनशील क्षेत्रों, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों और संभावित घुसपैठ मार्गों पर निगरानी बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी जुटाना भी महत्वपूर्ण होगा। आतंकवाद से मुकाबले में समय रहते मिली सूचना और उसके आधार पर की गई कार्रवाई अक्सर किसी बड़े हमले को रोकने में निर्णायक साबित हो सकती है।
तुर्किये से बढ़ती नजदीकी पर भी नजर
पाकिस्तान की बदलती रणनीति के बीच तुर्किये के साथ उसके बढ़ते सैन्य और रणनीतिक संबंध भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा और रणनीतिक सहयोग बढ़ा है। ऐसे में भारतीय सुरक्षा तंत्र इस बात पर नजर रखता है कि पाकिस्तान अपनी व्यापक सैन्य और रणनीतिक साझेदारियों का इस्तेमाल किस तरह करता है। हालांकि किसी देश के साथ सैन्य सहयोग को सीधे आतंकी गतिविधियों से जोड़ने के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं और इस संबंध में किसी निष्कर्ष से पहले उपलब्ध सूचनाओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन जरूरी है।
विदेशी लड़ाकों या बाहरी नेटवर्क के संभावित इस्तेमाल को लेकर भी सुरक्षा एजेंसियां सतर्क रहती हैं। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी बाहरी सहायता, प्रशिक्षण अथवा संसाधन की संभावना सुरक्षा जोखिम को बढ़ा सकती है। इसलिए भारत के लिए चुनौती केवल सीमा पार मौजूद आतंकी ठिकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलते अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, वित्तीय चैनलों और तकनीकी माध्यमों से जुड़े संभावित खतरों पर भी निगरानी रखना आवश्यक है। आने वाले महीनों में खुफिया जानकारी, सीमा सुरक्षा और स्थानीय सुरक्षा तंत्र के बीच बेहतर तालमेल इस चुनौती से निपटने में अहम भूमिका निभा सकता है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती नेटवर्क को जड़ से रोकना
पाकिस्तान द्वारा रणनीति बदलकर छोटे आतंकी मॉड्यूल की ओर बढ़ने की कोशिश सुरक्षा एजेंसियों के लिए निश्चित रूप से नई चुनौती पेश करती है। लेकिन छोटे नेटवर्क की एक कमजोरी यह भी होती है कि उन्हें सक्रिय रहने के लिए संपर्क, धन, हथियार और स्थानीय स्तर पर सहायता की जरूरत होती है। इन कड़ियों की समय रहते पहचान होने पर पूरे नेटवर्क को निष्क्रिय किया जा सकता है। इसलिए आने वाले समय में खुफिया तंत्र को केवल संभावित हमले पर नजर रखने के बजाय उन परिस्थितियों और संपर्कों की पहचान पर भी ध्यान देना होगा, जो किसी आतंकी मॉड्यूल को जन्म देते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की रणनीति में संभावित बदलाव यह संकेत देता है कि सीमा पार आतंकवाद की चुनौती समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उसका स्वरूप बदल सकता है। भारत के लिए इसका जवाब केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता। सीमा सुरक्षा, तकनीकी निगरानी, आतंकी वित्तपोषण पर रोक, स्थानीय खुफिया तंत्र को मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंक के नेटवर्क के खिलाफ सहयोग जैसे कदम समान रूप से महत्वपूर्ण होंगे। नवंबर और दिसंबर में संभावित खतरे के बीच सबसे प्रभावी रणनीति यही होगी कि किसी हमले का इंतजार करने के बजाय नेटवर्क की तैयारी को शुरुआती स्तर पर ही पहचानकर उसे निष्क्रिय कर दिया जाए।