अमेरिका डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच आर्कटिक सुरक्षा समझौता हुआ है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार इससे ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ेगी तथा अमेरिका को स्थायी सुरक्षा बेस और उड़ान अधिकार मिलेंगे। विरोधी देशों को सैन्य अड्डा बनाने सैनिक तैनात करने या संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश से रोकने की व्यवस्था होगी। अमेरिकी अधिकारियों ने खास तौर पर चीन और रूस का नाम लिया। डेनमार्क का कहना है कि समझौता उसकी और ग्रीनलैंड की संप्रभुता तथा लोगों के आत्मनिर्णय अधिकार को मान्यता देता है। अगले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान साइन होने की उम्मीद है लेकिन संसदों की मंजूरी जरूरी होगी।
चीन की नजर खनिजों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर
चीन की नजर ग्रीनलैंड के दुर्लभ खनिजों पर लंबे समय से रही है। 2016 में चीनी कंपनी शेंघे रिसोर्सेज ने ग्रीनलैंड मिनरल्स एंड एनर्जी में 12.5% हिस्सेदारी खरीदी। 2018 में समझौते से खनिजों की प्रोसेसिंग और मार्केटिंग में चीनी भूमिका बढ़ने की संभावना बनी। क्लिंगेनडेल की 2020 रिपोर्ट के अनुसार 2012 से चीनी निवेशकों और अधिकारियों की इंफ्रास्ट्रक्चर में दिलचस्पी दिखी। 2015 में ग्रीनलैंड के मंत्री ने चीन में सिनोहाइड्रो चाइना स्टेट कंस्ट्रक्शन और चाइना हार्बर इंजीनियरिंग से एयरपोर्ट हाइड्रोपावर और खनन पर बात की। 2018 में चीनी सरकारी कंपनी को एयरपोर्ट नेटवर्क विस्तार से रोका गया और एक कंपनी की बंद नौसैनिक अड्डा खरीदने की कोशिश डेनमार्क ने रोक दी।
पोलर सिल्क रोड और आर्कटिक महत्व
ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक के बीच रणनीतिक स्थिति में है। अमेरिका यूरोप और आर्कटिक के बीच कड़ी है। बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्तों और संसाधनों का महत्व बढ़ रहा है। चीन ने 2018 की आर्कटिक नीति में खुद को आर्कटिक नजदीकी देश बताया और पोलर सिल्क रोड विकसित करने की इच्छा जताई। अक्टूबर 2025 में चीनी कंटेनर जहाज नॉर्दर्न सी रूट से चीन से ब्रिटेन पहुंचा जो पहली बार था। यात्रा में सिर्फ 20 दिन लगे जो सामान्य रास्ते का आधा समय है। यह जहाज चीन नियंत्रित कंपनी के जरिए चला। आर्कटिक शिपिंग में चीन की दिलचस्पी साफ दिखती है।
सैन्य खतरा या आर्थिक दिलचस्पी
चीन की मौजूदगी को सीधे सैन्य खतरे के रूप में पेश करना सही नहीं। 2026 की स्वीडिश नेशनल चाइना सेंटर समीक्षा के अनुसार ग्रीनलैंड आसपास चीनी युद्धपोतों की मौजूदगी का कोई सबूत नहीं। कार्नेगी समीक्षा कहती है कि चीन और रूस ग्रीनलैंड के प्रमुख साझेदार नहीं। कई खनन प्रोजेक्ट जमीन पर शुरू नहीं हो सके। क्वानेफजेल्ड में यूरेनियम खनन पर 2021 में रोक लगी। चीन की दिलचस्पी मुख्य रूप से खनिज इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्कटिक शिपिंग तक सीमित रही। अमेरिकी डील का मकसद भविष्य के रणनीतिक प्रभाव को रोकना है।
डील का उद्देश्य और आगे की राह
नई डील का मुख्य लक्ष्य चीन और रूस के भविष्य के रणनीतिक प्रभाव को सीमित करना है। अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने और विरोधी निवेश रोकने से आर्कटिक में संतुलन बनाए रखने की कोशिश है। ग्रीनलैंड की संप्रभुता का सम्मान करते हुए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जा रही है। खनिज संसाधनों और नए समुद्री मार्गों के बढ़ते महत्व को देखते हुए यह समझौता महत्वपूर्ण है। संसदों की मंजूरी के बाद लागू होने पर आर्कटिक भूराजनीति में नया अध्याय शुरू हो सकता है। चीन की पिछले वर्षों की गतिविधियां इस डील की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करती हैं।