जकार्ता/वाशिंगटन: वैश्विक समुद्री राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) पर अपनी निगरानी बढ़ाने के लिए इंडोनेशिया के साथ एक ‘बृहद रक्षा सहयोग साझेदारी’ समझौता किया है। 13 अप्रैल को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस ऐतिहासिक रक्षा संधि की जानकारी साझा की।
मलक्का: वैश्विक व्यापार की 'लाइफलाइन'
मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यह अंडमान सागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है। वैश्विक व्यापार का लगभग 25% और दुनिया के कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का 35% इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। मलय प्रायद्वीप और सुमात्रा द्वीप के बीच स्थित यह मार्ग अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए रीढ़ की हड्डी माना जाता है।
चीन की घेराबंदी और अमेरिकी रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस समझौते के जरिए इंडोनेशिया के हवाई और समुद्री क्षेत्र तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है ताकि मलक्का में चीन की गतिविधियों पर अंकुश लगाया जा सके। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह इस मार्ग पर निर्भर है। हालांकि, इंडोनेशिया ने अभी अमेरिका को पूर्ण हवाई पहुंच की अनुमति नहीं दी है, जिस पर कूटनीतिक बातचीत जारी है।
भारत की भूमिका और रणनीतिक हित
भारत के लिए भी मलक्का जलडमरूमध्य का महत्व कम नहीं है। भारत का लगभग 60% समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होता है।
अंडमान-निकोबार से निकटता: अंडमान द्वीप समूह से इसकी दूरी मात्र 600 किलोमीटर है, जो भारत को एक प्राकृतिक बढ़त देती है।
संयुक्त निगरानी: हाल ही में भारत और सिंगापुर के बीच भी इस क्षेत्र में संयुक्त निगरानी को लेकर चर्चा हुई है।
अमेरिका-इंडोनेशिया समझौता और भारत की सक्रियता स्पष्ट संकेत दे रही है कि आने वाले समय में मलक्का जलडमरूमध्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन को घेरने का मुख्य केंद्र बनेगा। जासूसी जहाजों और बढ़ती सैन्य मौजूदगी ने इस जलमार्ग को 'बैटलग्राउंड' में बदल दिया है।