विश्व हिंदी दिवस प्रतिवर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। यह तिथि इसलिए विशेष है क्योंकि 10 जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ था, जिसने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सशक्त पहचान दिलाई। इसी ऐतिहासिक पहल की स्मृति में भारत सरकार ने वर्ष 2006 से 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। इस दिवस का उद्देश्य हिंदी को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करना और उसे अंतरराष्ट्रीय संवाद की प्रभावी भाषा के रूप में स्थापित करना है।
हिंदी : केवल भाषा नहीं, सांस्कृतिक चेतना
हिंदी भारत की राजभाषा होने के साथ-साथ करोड़ों लोगों की मातृभाषा है। यह भाषा भारतीय जीवन दर्शन, सामाजिक मूल्यों, परंपराओं और भावनात्मक अभिव्यक्तियों की संवाहक है। हिंदी में लोकजीवन की सरलता भी है और शास्त्रीय विचारों की गहराई भी। यही कारण है कि हिंदी आम जनमानस से लेकर साहित्यिक विमर्श तक समान रूप से प्रभावशाली बनी हुई है।
हिंदी साहित्य और राष्ट्रीय निर्माण
तुलसीदास, कबीर, सूरदास, भारतेन्दु, प्रेमचंद, निराला और महादेवी वर्मा जैसे महान साहित्यकारों ने हिंदी को विचार, संवेदना और सामाजिक चेतना की ऊँचाइयों तक पहुँचाया। हिंदी साहित्य ने स्वतंत्रता आंदोलन, समाज सुधार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह साहित्य केवल रचनात्मक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की वैचारिक नींव भी रहा है।
वैश्विक मंच पर हिंदी की बढ़ती उपस्थिति
आज हिंदी केवल भारत तक सीमित नहीं रही है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, नेपाल और खाड़ी देशों सहित विश्व के अनेक हिस्सों में हिंदी बोली, पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। प्रवासी भारतीयों ने हिंदी को अपनी सांस्कृतिक पहचान के रूप में जीवित रखा है। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने की माँग, उसकी बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और प्रभाव का प्रमाण है।
आधुनिक युग में हिंदी की चुनौतियाँ और संभावनाएँ
डिजिटल और तकनीकी युग में हिंदी को विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, प्रबंधन और नवाचार से जोड़ना समय की आवश्यकता है। यदि हिंदी को रोजगार और शोध की भाषा नहीं बनाया गया, तो उसका विकास सीमित रह जाएगा। आज आवश्यकता है कि उच्च गुणवत्ता का ज्ञान हिंदी में भी सृजित हो, ताकि भाषा आत्मनिर्भर बने और नई पीढ़ी इसे आधुनिक संदर्भों में अपनाने के लिए प्रेरित हो।
आत्मचिंतन और दायित्व का दिवस
विश्व हिंदी दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है कि क्या हम स्वयं अपनी भाषा को पर्याप्त सम्मान दे रहे हैं। क्या हम हिंदी में सोचने, लिखने और सृजन करने को प्रोत्साहित कर रहे हैं? हिंदी का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब हम गर्व के साथ इसका प्रयोग करेंगे और इसे समयानुकूल समृद्ध बनाएँगे। यह दिवस भाषा के माध्यम से राष्ट्र, संस्कृति और वैश्विक संवाद से जुड़ने की प्रेरणा देता है।
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