40 वर्ष की उम्र के आसपास शरीर में कई ऐसे बदलाव शुरू हो सकते हैं, जिनका असर वजन और मेटाबॉलिज्म से लेकर रक्तचाप, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल तक पर पड़ता है। उम्र बढ़ने के साथ पहले की तुलना में शारीरिक गतिविधि कम हो सकती है, जबकि खानपान और कैलोरी का सेवन पहले जैसा ही बना रहता है। ऐसी स्थिति में शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा वसा के रूप में जमा होने लगती है और खासकर पेट के आसपास चर्बी बढ़ सकती है। यह बदलाव धीरे-धीरे हृदय संबंधी जोखिम कारकों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए 40 के बाद स्वस्थ वजन बनाए रखने के साथ नियमित स्वास्थ्य जांच पर भी ध्यान देना महत्वपूर्ण हो जाता है।
सिर्फ तला-भुना खाना ही कोलेस्ट्रॉल के लिए जिम्मेदार नहीं
कोलेस्ट्रॉल को लेकर सबसे आम धारणा यह है कि ज्यादा तेल, घी, तला-भुना या वसायुक्त भोजन ही इसकी वजह है। खानपान निश्चित रूप से रक्त में लिपिड के स्तर को प्रभावित करता है, लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। उम्र, आनुवंशिक प्रवृत्ति, शारीरिक गतिविधि, वजन और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी कोलेस्ट्रॉल को प्रभावित कर सकती हैं। कुछ लोगों का खानपान अपेक्षाकृत संतुलित होने के बावजूद उनका एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है। इसलिए केवल भोजन को जिम्मेदार मानने के बजाय जीवनशैली और पारिवारिक स्वास्थ्य इतिहास को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
उम्र बढ़ने के साथ एलडीएल क्यों बढ़ सकता है
रक्त में मौजूद एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को आम तौर पर खराब कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है, क्योंकि इसका अधिक स्तर धमनियों में वसा के जमाव से जुड़ा होता है। शरीर से एलडीएल को हटाने में यकृत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उम्र बढ़ने के साथ कुछ लोगों में इस प्रक्रिया की प्रभावशीलता में बदलाव आ सकता है, जिससे रक्त में एलडीएल का स्तर बढ़ने की संभावना रहती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि 40 वर्ष की उम्र पूरी होते ही हर व्यक्ति का कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाएगा। बल्कि उम्र बढ़ना उन कई कारकों में से एक है, जो समय के साथ कोलेस्ट्रॉल प्रोफाइल को प्रभावित कर सकते हैं।
हार्मोनल बदलाव भी बदल सकते हैं शरीर का संतुलन
40 के बाद महिलाओं और पुरुषों दोनों में हार्मोन तथा शरीर में वसा के वितरण से जुड़े बदलाव होने लगते हैं। महिलाओं में मेनोपॉज के आसपास होने वाले हार्मोनल परिवर्तन शरीर की संरचना और रक्त में लिपिड के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं। पुरुषों में भी उम्र के साथ हार्मोनल स्तर और मांसपेशियों तथा वसा के अनुपात में बदलाव हो सकता है। हालांकि, इन बदलावों को कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का अकेला कारण मानना उचित नहीं होगा। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति अलग होती है और आनुवंशिकता, वजन, भोजन, व्यायाम तथा अन्य स्वास्थ्य कारकों का प्रभाव भी महत्वपूर्ण रहता है।
कम होती शारीरिक गतिविधि बन सकती है बड़ी वजह
उम्र बढ़ने के साथ काम, परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों के कारण शारीरिक गतिविधि कम होना आम बात है। लंबे समय तक बैठकर काम करना और नियमित व्यायाम के लिए समय न निकाल पाना वजन बढ़ने तथा मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर के वजन को नियंत्रित रखने में मदद करती है और स्वस्थ रक्त लिपिड प्रोफाइल बनाए रखने में भी योगदान दे सकती है। इसलिए 40 के बाद व्यायाम को केवल वजन घटाने का माध्यम नहीं, बल्कि समग्र हृदय स्वास्थ्य की दिनचर्या का हिस्सा समझना चाहिए।
पेट की बढ़ती चर्बी को नजरअंदाज न करें
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में वसा का वितरण भी बदल सकता है और कई लोगों में पेट के आसपास वसा जमा होने लगती है। पेट की अतिरिक्त चर्बी केवल शरीर के आकार से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह कई मेटाबॉलिक जोखिम कारकों के साथ जुड़ी हो सकती है। वजन बढ़ने के साथ रक्तचाप और रक्त शर्करा में बदलाव तथा कोलेस्ट्रॉल प्रोफाइल में असंतुलन की संभावना भी बढ़ सकती है। इसलिए 40 के बाद केवल वजन मशीन पर दिखाई देने वाली संख्या पर ध्यान देने के बजाय कमर का आकार, शारीरिक सक्रियता और संपूर्ण स्वास्थ्य को भी महत्व देना चाहिए।
आनुवंशिकता भी तय कर सकती है कोलेस्ट्रॉल का स्तर
कुछ लोगों में उच्च कोलेस्ट्रॉल की प्रवृत्ति परिवार से मिल सकती है। ऐसे मामलों में व्यक्ति का खानपान और जीवनशैली ठीक होने के बावजूद एलडीएल का स्तर सामान्य से अधिक रह सकता है। यदि परिवार में कम उम्र में हृदय रोग या बहुत अधिक कोलेस्ट्रॉल का इतिहास रहा है, तो डॉक्टर को इसकी जानकारी देना उपयोगी होता है। ऐसे लोगों में नियमित लिपिड प्रोफाइल जांच के जरिए स्थिति पर नजर रखना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। आनुवंशिक कारण होने की स्थिति में केवल खानपान में बदलाव पर्याप्त नहीं भी हो सकता है।
40 के बाद नियमित जांच क्यों जरूरी है
कोलेस्ट्रॉल बढ़ने की खास बात यह है कि अक्सर इसके शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति पूरी तरह सामान्य महसूस कर सकता है, जबकि रक्त में एलडीएल या अन्य लिपिड का स्तर बढ़ा हुआ हो। इसलिए केवल शरीर में किसी लक्षण के दिखाई देने का इंतजार करना उचित नहीं है। उम्र, पारिवारिक इतिहास और अन्य जोखिम कारकों के आधार पर डॉक्टर से सलाह लेकर लिपिड प्रोफाइल जैसी जांच कराना उपयोगी हो सकता है। यदि रिपोर्ट में असामान्यता मिलती है, तो डॉक्टर व्यक्ति की पूरी स्वास्थ्य स्थिति को देखकर आगे की रणनीति तय कर सकते हैं।
खानपान और जीवनशैली में संतुलन सबसे जरूरी
40 के बाद कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने के लिए किसी एक चीज पर निर्भर रहने के बजाय समग्र जीवनशैली पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है। संतुलित भोजन, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन, पर्याप्त नींद और धूम्रपान से दूरी जैसे कदम हृदय स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकते हैं। भोजन में सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें और उपयुक्त मात्रा में प्रोटीन शामिल करना तथा अत्यधिक प्रसंस्कृत और संतृप्त वसा वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना मददगार हो सकता है। यदि कोलेस्ट्रॉल पहले से बढ़ा हुआ है, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।