बैतूल. सतपुड़ा पर्वतमाला की गोद में बसे बैतूल जिले के भैंसदेही तहसील स्थित कुकरू गांव को मध्य भारत की सबसे अनोखी प्राकृतिक धरोहरों में गिना जाता है। समुद्र तल से लगभग 3,668 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह इलाका घने जंगलों, हरियाली से ढकी पहाड़ियों, बादलों से घिरी घाटियों और सालभर सुहावने मौसम के लिए प्रसिद्ध है। मानसून और सर्दियों के दौरान यहां का मनमोहक दृश्य किसी प्रसिद्ध हिल स्टेशन से कम नहीं लगता। यही वजह है कि स्थानीय लोग इसे प्रेम से 'मिनी पचमढ़ी' के नाम से भी जानते हैं।
1944 में ब्रिटिश महिला ने रखी थी कॉफी क्रांति की नींव
कुकरू की सबसे बड़ी पहचान यहां स्थित ऐतिहासिक कॉफी बागान है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1944 में ब्रिटिश महिला फ्लोरेंस हैंड्रिक्स ने की थी। उन्होंने लगभग 44 हेक्टेयर यानी करीब 160 एकड़ भूमि पर कॉफी की खेती प्रारंभ कर इस क्षेत्र को नई पहचान दी। सतपुड़ा की ऊंचाई, ठंडा मौसम और उपयुक्त मिट्टी कॉफी उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल साबित हुई। कुछ ही वर्षों में यहां उच्च गुणवत्ता वाली कॉफी बीन्स का उत्पादन होने लगा और कुकरू मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक कॉफी क्षेत्रों में शामिल हो गया। आज भी यह विरासत इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखे हुए है।
मुख्यमंत्री के दौरे से विकास की नई उम्मीद
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रस्तावित दौरे ने क्षेत्रवासियों में नई ऊर्जा का संचार किया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि सरकार इस ऐतिहासिक कॉफी बागान के संरक्षण, विस्तार और ब्रांडिंग पर विशेष ध्यान देती है तो कुकरू राष्ट्रीय स्तर का कॉफी और इको-टूरिज्म डेस्टिनेशन बन सकता है। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, कॉफी उत्पादकों को बेहतर बाजार मिलेगा और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिल सकेगी।
पर्यटन और कृषि का अनूठा संगम बन सकता है कुकरू
विशेषज्ञों का मानना है कि कुकरू में केवल कॉफी उत्पादन ही नहीं, बल्कि प्रकृति आधारित पर्यटन की भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यदि यहां आधुनिक पर्यटन सुविधाएं, होम-स्टे, ट्रैकिंग मार्ग, कॉफी अनुभव केंद्र और स्थानीय उत्पादों के विपणन की बेहतर व्यवस्था विकसित की जाए तो यह क्षेत्र देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है। कॉफी बागानों के बीच प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव पर्यटकों के लिए एक अलग पहचान बना सकता है, जिससे बैतूल जिले को पर्यटन मानचित्र पर नई जगह मिल सकती है।
मध्य भारत की विरासत को नई पहचान देने का अवसर
कुकरू केवल एक गांव नहीं, बल्कि मध्य भारत की कृषि, इतिहास और प्राकृतिक संपदा का जीवंत प्रतीक है। लगभग आठ दशक पुरानी कॉफी परंपरा, मनमोहक प्राकृतिक वातावरण और ऐतिहासिक महत्व इसे देश के अन्य कॉफी क्षेत्रों से अलग पहचान देते हैं। यदि योजनाबद्ध तरीके से संरक्षण और विकास किया जाए तो यह क्षेत्र न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे भारत के कॉफी पर्यटन का नया केंद्र बन सकता है। मुख्यमंत्री का प्रस्तावित दौरा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।