पेपर लीक और संगठित परीक्षा धोखाधड़ी पर सख्ती बढ़ाने वाला लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन अधिनियम, 2026 अब लागू हो गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद इसे 31 जुलाई 2026 को राजपत्र में अधिनियम संख्या 10 of 2026 के रूप में प्रकाशित किया गया। नए संशोधन ने वर्ष 2024 के मूल कानून में सजा, जुर्माना, जांच और ट्रायल से जुड़े प्रावधानों को अधिक कठोर बनाया है।
पेपर लीक करने वालों को कितने साल की जेल होगी?
सजा इस बात पर निर्भर करेगी कि अपराध किसी व्यक्ति ने किया है या इसके पीछे संगठित गिरोह, परीक्षा एजेंसी अथवा सेवा प्रदाता की भूमिका है। सामान्य रूप से प्रश्नपत्र या उत्तर कुंजी लीक करने, बिना अनुमति प्रश्नपत्र हासिल करने, अभ्यर्थी को उत्तर उपलब्ध कराने, ओएमआर शीट से छेड़छाड़ करने या परीक्षा सिस्टम में हेरफेर करने वाले व्यक्ति को कम-से-कम पांच साल और अधिकतम 10 साल की जेल हो सकती है। इसके साथ ₹50 लाख तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
सजा और जुर्माने का पूरा प्रावधान
| अपराध या जिम्मेदारी | जेल | जुर्माना और दूसरी कार्रवाई |
|---|---|---|
| किसी व्यक्ति द्वारा पेपर लीक या अन्य अनुचित साधन | 5 से 10 साल | ₹50 लाख तक |
| परीक्षा सेवा प्रदाता की संलिप्तता | संस्था पर जेल लागू नहीं | ₹5 करोड़ तक जुर्माना, परीक्षा का आनुपातिक खर्च वसूली और 8 साल का प्रतिबंध |
| सेवा प्रदाता के निदेशक या वरिष्ठ प्रबंधन की मिलीभगत | 5 से 10 साल | ₹5 करोड़ जुर्माना |
| संगठित परीक्षा अपराध | 7 से 10 साल | कम-से-कम ₹10 करोड़ जुर्माना |
| संस्था का संगठित अपराध में शामिल होना | संबंधित व्यक्तियों पर लागू सजा | संपत्ति जब्त, कुर्की और परीक्षा खर्च की वसूली |
यह सूची मूल अधिनियम की अनुसूची में दी गई है। 2026 के संशोधन ने सजा और न्यायिक प्रक्रिया बदली है, लेकिन परीक्षाओं की यह मूल अनुसूची नहीं बदली गई।
NEET, JEE Main और CUET पर लागू होगा कानून?
हां। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का नाम कानून की अनुसूची में स्पष्ट रूप से शामिल है। इसलिए NTA द्वारा आयोजित परीक्षाएं इसके दायरे में आती हैं।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- NEET-UG;
- JEE Main;
- CUET-UG और CUET-PG;
- UGC-NET;
- Joint CSIR-UGC NET;
- CMAT;
- AIAPGET;
- NCHM JEE;
JIPMAT और NTA द्वारा आयोजित दूसरी परीक्षाएं।
NTA की आधिकारिक परीक्षा सूची में NEET-UG, JEE Main, CUET, UGC-NET और CSIR-NET सहित कई प्रवेश एवं पात्रता परीक्षाएं दर्ज हैं।
क्या JEE Advanced भी कानून के दायरे में है?
JEE Main स्पष्ट रूप से इसके दायरे में है, क्योंकि इसे NTA आयोजित करता है। JEE Advanced का आयोजन NTA नहीं करता। इसलिए कानून की मौजूदा अनुसूची के आधार पर JEE Advanced अपने आप शामिल नहीं माना जाएगा, जब तक उसकी परीक्षा कराने वाली संबंधित अथॉरिटी को केंद्र सरकार अलग से अधिसूचित न करे।
क्या राज्य स्तरीय परीक्षाओं पर भी कानून लागू होगा?
MPPSC, UPPSC, राज्य पुलिस भर्ती, शिक्षक भर्ती, राज्य कर्मचारी चयन बोर्ड, राज्य बोर्ड परीक्षाएं और राज्य विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं इस केंद्रीय कानून के दायरे में अपने आप नहीं आतीं।
किसी राज्य परीक्षा पर कार्रवाई इन स्थितियों में हो सकती है:
- संबंधित प्राधिकरण को केंद्र सरकार इस अधिनियम के तहत अधिसूचित करे
- राज्य सरकार ने अपना एंटी-पेपर लीक या परीक्षा कानून बनाया हो
- घटना पर भारतीय न्याय संहिता, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम या अन्य लागू कानूनों में कार्रवाई की जाए।
मूल अधिनियम के उद्देश्यों में इसे राज्यों के लिए एक मॉडल कानून बताया गया था, जिसे राज्य अपनी जरूरत के अनुसार अपना सकते हैं। इसलिए “यह कानून देश की हर परीक्षा पर लागू है” लिखना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
क्या स्कूल बोर्ड और विश्वविद्यालय परीक्षाएं शामिल हैं?
CBSE, राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, निजी स्कूल, राज्य विश्वविद्यालय और निजी विश्वविद्यालय केवल “परीक्षा” आयोजित करने के कारण स्वतः इस कानून के दायरे में नहीं आ जाते।
संबंधित बोर्ड या प्राधिकरण को कानून की अनुसूची में शामिल होना चाहिए अथवा केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त दूसरे केंद्रीय या राज्य कानून अलग से लागू हो सकते हैं।
किन गतिविधियों को परीक्षा अपराध माना गया है?
कानून केवल प्रश्नपत्र लीक तक सीमित नहीं है। इसमें परीक्षा से जुड़ी 15 श्रेणियों की गतिविधियों को अनुचित साधन माना गया है। प्रमुख अपराधों में शामिल हैं:
- प्रश्नपत्र, उत्तर कुंजी या उसके किसी हिस्से को लीक करना
- पेपर लीक कराने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति से मिलीभगत करना
- बिना अधिकार प्रश्नपत्र या ओएमआर शीट हासिल करना
- परीक्षा के दौरान किसी अभ्यर्थी को अनधिकृत उत्तर उपलब्ध कराना
- उत्तर पुस्तिका, ओएमआर शीट, मूल्यांकन या मेरिट सूची से छेड़छाड़
- कंप्यूटर नेटवर्क, सर्वर या परीक्षा सिस्टम में हेरफेर
- परीक्षा की तारीख, शिफ्ट या बैठने की व्यवस्था बदलकर अनुचित लाभ देना
- परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था को जानबूझकर कमजोर करना
- फर्जी वेबसाइट, फर्जी परीक्षा, नकली एडमिट कार्ड या नियुक्ति पत्र बनाना
- परीक्षा कर्मचारियों को धमकाना या परीक्षा प्रक्रिया में बाधा डालना।
इन गतिविधियों के लिए आर्थिक लाभ होना जरूरी नहीं; कानून “monetary or wrongful gain” यानी आर्थिक या अन्य अनुचित लाभ के उद्देश्य को शामिल करता है।
क्या सामान्य नकल करने वाले छात्र को भी 10 साल की जेल होगी?
सिर्फ परीक्षा कक्ष में सामान्य नकल करते पकड़े गए अभ्यर्थी को अपने आप पांच से 10 साल की जेल देना इस कानून का घोषित उद्देश्य नहीं है। मूल विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के वक्तव्य में कहा गया था कि सामान्य अभ्यर्थियों से जुड़े मामलों पर संबंधित परीक्षा प्राधिकरण के मौजूदा प्रशासनिक नियम लागू रहेंगे। ऐसे मामलों में पेपर रद्द करना, परिणाम रोकना या कुछ वर्षों के लिए परीक्षा से बाहर करना जैसी कार्रवाई हो सकती है। केंद्रीय कानून का मुख्य लक्ष्य आर्थिक या अनुचित लाभ के लिए परीक्षा व्यवस्था में सेंध लगाने वाले व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठित गिरोहों पर कार्रवाई करना है।
हालांकि किसी अभ्यर्थी की पेपर लीक गिरोह, आपराधिक साजिश, फर्जी दस्तावेज, प्रतिरूपण या आर्थिक लेन-देन में सक्रिय भूमिका सामने आती है तो मामले के तथ्यों के आधार पर इस कानून या दूसरे आपराधिक कानूनों में कार्रवाई हो सकती है।
दो महीने में जांच, तीन महीने में ट्रायल
नए संशोधन के तहत पेपर लीक और परीक्षा धोखाधड़ी की जांच सामान्य रूप से दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी। जांच राज्य पुलिस के डीएसपी या एसीपी से कम रैंक के अधिकारी नहीं कर सकेंगे। केंद्र सरकार जांच किसी केंद्रीय एजेंसी या विशेष रूप से गठित स्पेशल टास्क फोर्स को भी सौंप सकती है।
प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश को संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके सत्र न्यायालय को Special Fast Track Court के रूप में नामित करना होगा। इन अदालतों में रोजाना आधार पर सुनवाई होगी और आरोपपत्र दाखिल होने के तीन महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का प्रावधान है।
कानून लागू होने के समय लंबित मामले भी संबंधित विशेष फास्ट ट्रैक अदालत में स्थानांतरित किए जाएंगे। प्रत्येक विशेष अदालत के लिए एक या अधिक विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किए जाने हैं।
तीन महीने में फैसला नहीं आया तो क्या केस खत्म हो जाएगा?
नहीं। कानून ट्रायल पूरा करने के लिए तीन महीने की समयसीमा निर्धारित करता है, लेकिन समयसीमा चूकने पर मामला स्वतः खत्म होने या आरोपी के स्वतः बरी होने का कोई प्रावधान नहीं है।
विधायी विश्लेषण में यह भी बताया गया है कि जांच दो महीने में पूरी न होने की स्थिति में अधिकारी के खिलाफ क्या परिणाम होगा, संशोधन में इसका अलग विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए समयसीमा को तेज जांच और ट्रायल के कानूनी निर्देश के रूप में समझना चाहिए, न कि स्वतः केस समाप्त होने की तारीख के रूप में।
फैसले के खिलाफ अपील कहां होगी?
विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले, सजा या जमानत आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जा सकेगी। अपील की सुनवाई हाई कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ करेगी। सामान्य रूप से अपील 30 दिन में दाखिल करनी होगी। पर्याप्त कारण होने पर हाई कोर्ट देरी स्वीकार कर सकता है, लेकिन कानून में 90 दिन के बाद अपील स्वीकार न करने का प्रावधान है। स्वीकृत अपील को यथासंभव तीन महीने में निपटाने का लक्ष्य रखा गया है।
FAQ: Anti Paper Leak Law 2026
पेपर लीक में अधिकतम कितनी जेल हो सकती है?
किसी व्यक्ति को पांच से 10 साल तक जेल हो सकती है। संगठित परीक्षा अपराध में न्यूनतम सात और अधिकतम 10 साल की जेल का प्रावधान है।
पेपर लीक गिरोह पर कितना जुर्माना लगेगा?
संगठित अपराध के मामले में जुर्माना कम-से-कम ₹10 करोड़ होगा। यह अधिकतम सीमा नहीं है।
क्या NEET-UG पर कानून लागू है?
हां। NEET-UG का आयोजन NTA करता है और NTA कानून की अनुसूची में शामिल है।
क्या JEE Main पर भी कानून लागू होगा?
हां। JEE Main NTA द्वारा आयोजित परीक्षा है। JEE Advanced की स्थिति अलग है क्योंकि उसका आयोजन NTA नहीं करता।
क्या MPPSC परीक्षा इस केंद्रीय कानून में शामिल है?
MPPSC का नाम मौजूदा केंद्रीय अनुसूची में नहीं है। इसलिए यह कानून MPPSC पर अपने आप लागू नहीं माना जाएगा। मध्य प्रदेश के अपने कानून और दूसरे आपराधिक प्रावधान अलग से लागू हो सकते हैं।
क्या सामान्य छात्र को नकल पर 10 साल जेल होगी?
सामान्य अभ्यर्थी के अनुशासन और नकल से जुड़े मामलों पर परीक्षा प्राधिकरण के प्रशासनिक नियम लागू रहने की बात मूल विधेयक के उद्देश्यों में कही गई है। संगठित गिरोह, आर्थिक लेन-देन या आपराधिक साजिश में भूमिका होने पर स्थिति अलग हो सकती है।
क्या अपराध में जमानत मिल सकती है?
अपराध गैर-जमानती हैं। इसका अर्थ है कि जमानत अधिकार के रूप में स्वतः नहीं मिलेगी; अदालत मामले के तथ्यों और कानून के आधार पर निर्णय करेगी।