धार. मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने भोजशाला परिसर को देवी सरस्वती यानी वाग्देवी का मंदिर मानते हुए केंद्र सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि लंदन स्थित ब्रिटिश संग्रहालय में रखी वाग्देवी की ऐतिहासिक प्रतिमा को वापस भारत लाने के लिए औपचारिक और गंभीर प्रयास किए जाएं। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को भोजशाला परिसर के संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपते हुए यह भी स्पष्ट किया कि इस सांस्कृतिक धरोहर का ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गहरा है। फैसले के बाद वर्षों से चल रही प्रतिमा वापसी की मांग ने नई गति पकड़ ली है।
राजा भोज के काल में स्थापित हुई थी वाग्देवी प्रतिमा
इतिहासकारों के अनुसार यह प्रतिमा 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज के शासनकाल में स्थापित की गई थी। उस समय भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि विद्या, दर्शन और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र मानी जाती थी। वाग्देवी की यह प्रतिमा मंदिर के मुख्य गर्भगृह में विराजमान थी और विद्या की अधिष्ठात्री देवी के रूप में इसकी विशेष पूजा होती थी। कला और शिल्प की दृष्टि से भी यह मूर्ति भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्ट धरोहर मानी जाती है।
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद बदली तस्वीर
साल 1305 में दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान भोजशाला परिसर को गंभीर क्षति पहुंची थी। कई ऐतिहासिक संरचनाएं ध्वस्त हो गईं और मंदिर का मूल स्वरूप प्रभावित हुआ। बताया जाता है कि उसी दौर में वाग्देवी की प्रतिमा भी मलबे के नीचे दब गई थी। इसके बाद कई सदियों तक यह अनमोल धरोहर इतिहास की परतों में छिपी रही। ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1875 के आसपास खुदाई के दौरान यह प्रतिमा दोबारा सामने आई, जिसने पुरातत्वविदों को भी चौंका दिया था।
अंग्रेज अधिकारी प्रतिमा को ले गया था लंदन
इतिहास से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि खुदाई में मिली इस बहुमूल्य प्रतिमा को वर्ष 1880 में एक ब्रिटिश अधिकारी अपने साथ इंग्लैंड ले गया था। इसके बाद से यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित है। हाल ही में सामने आई संग्रहालय की फुटेज और तस्वीरों ने भारत में इस मुद्दे को फिर गर्मा दिया। कई सांस्कृतिक संगठनों और इतिहासकारों का कहना है कि यह प्रतिमा भारत की अमूल्य धरोहर है और इसे उसके मूल स्थान पर वापस लाया जाना चाहिए।
चार फीट ऊंची प्रतिमा में छिपा है भारत का सांस्कृतिक वैभव
करीब चार फीट ऊंची और लगभग 250 किलोग्राम वजनी यह प्रतिमा अपनी अद्भुत शिल्पकला के कारण विश्वभर में चर्चित है। प्रतिमा के निचले हिस्से में देवनागरी लिपि में संस्कृत श्लोक अंकित हैं, जो इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक प्रामाणिकता को और मजबूत करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतिमा केवल एक कलाकृति नहीं बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के एक कला इतिहासकार ने भी माना कि भले ही ब्रिटेन इन धरोहरों को सुरक्षित रखता है, लेकिन उनके वास्तविक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को भारत जैसा समझ पाना संभव नहीं है।
भोजशाला विवाद के बीच बढ़ा सांस्कृतिक विमर्श
भोजशाला लंबे समय से ऐतिहासिक और धार्मिक विवादों का केंद्र रही है। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह बहस और तेज हो गई है कि भारत से औपनिवेशिक काल में ले जाई गई धरोहरों को वापस लाने के लिए व्यापक नीति बनाई जानी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वाग्देवी प्रतिमा की वापसी होती है तो यह केवल एक मूर्ति की वापसी नहीं होगी, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और ऐतिहासिक गौरव की पुनर्स्थापना का प्रतीक बनेगी।