भारत में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लाखों मरीजों के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का यह फैसला किसी वरदान से कम नहीं है। अदालत ने जाइडस लाइफसाइंसेज़ को कैंसर की अत्यंत महंगी इम्यूनोथेरेपी दवा ‘निवोलुमैब’ का किफायती संस्करण बाजार में उतारने की अनुमति देकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि जब मामला जीवन और स्वास्थ्य का हो, तब कानून का झुकाव जनहित की ओर होना चाहिए। यह फैसला केवल एक कंपनी को अनुमति भर नहीं, बल्कि भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था में समानता और पहुंच की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
पेटेंट बनाम मरीज की जिंदगी का टकराव
इस पूरे मामले की जड़ अमेरिकी दवा कंपनी ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब की दवा ‘ओपडिवो’ से जुड़ी है, जिस पर मई 2026 तक पेटेंट सुरक्षा प्राप्त है। इसकी ऊंची कीमत ने इसे आम मरीज की पहुंच से बाहर कर रखा था। जाइडस द्वारा विकसित बायोसिमिलर ZRC 3276 पर पहले रोक लगाई गई थी, लेकिन अब खंडपीठ ने इस रोक को हटाते हुए स्पष्ट किया कि पेटेंट अधिकार महत्वपूर्ण हैं, पर वे जीवन रक्षक उपचार तक पहुंच में बाधा नहीं बन सकते।
अदालत की मानवीय सोच बनी मिसाल
जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की पीठ ने अपने निर्णय में जिस मानवीय दृष्टिकोण को सामने रखा, उसने इस फैसले को ऐतिहासिक बना दिया। कोर्ट ने माना कि केवल बौद्धिक संपदा अधिकारों के आधार पर बड़ी आबादी को आधुनिक इलाज से वंचित रखना संवैधानिक भावना के विपरीत है। साथ ही अदालत ने संतुलन बनाए रखते हुए जाइडस को बिक्री का पूरा लेखा-जोखा रखने का निर्देश दिया, ताकि भविष्य में पेटेंट धारक के अधिकारों का समुचित मूल्यांकन किया जा सके।
इलाज सस्ता, उम्मीदें मजबूत
निवोलुमैब जैसी इम्यूनोथेरेपी दवाएं फेफड़ों, किडनी और त्वचा के कैंसर में बेहद प्रभावी मानी जाती हैं, लेकिन उनकी कीमत मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए असहनीय होती है। जाइडस का दावा है कि उसका संस्करण लगभग 70 प्रतिशत तक सस्ता होगा, जिससे इलाज का बोझ काफी कम होगा। इससे न केवल बड़े निजी अस्पतालों में, बल्कि छोटे शहरों और सरकारी चिकित्सा केंद्रों में भी इस आधुनिक उपचार की पहुंच संभव हो सकेगी।
स्वास्थ्य न्याय की दिशा में बड़ा कदम
यह फैसला केवल एक दवा की मंजूरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सोच का प्रतीक है, जिसमें स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार के रूप में देखा जा रहा है। सस्ती निवोलुमैब दवा से कैंसर मरीजों को न केवल आर्थिक राहत मिलेगी, बल्कि यह विश्वास भी मजबूत होगा कि न्याय प्रणाली आम आदमी के जीवन और गरिमा की रक्षा के लिए खड़ी है।
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