दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि बैंक खाता किसी भी नागरिक के आर्थिक अस्तित्व का मूल आधार होता है। आधुनिक जीवन में व्यक्ति की आय, बचत, व्यापार और दैनिक लेन-देन पूरी तरह बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भर हैं। ऐसे में बिना पर्याप्त कानूनी आधार के किसी खाते को फ्रीज करना सीधे तौर पर व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार को प्रभावित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी कार्रवाई केवल संदेह के आधार पर नहीं की जा सकती।
गुजरात साइबर अपराध शाखा की शिकायत पर लगी थी रोक
यह मामला गुजरात की साइबर अपराध शाखा की शिकायत से जुड़ा था, जिसके आधार पर नवंबर 2024 में एक निजी बैंक ने खाताधारक के खाते पर रोक लगा दी थी। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने पाया कि याचिकाकर्ता को किसी अपराध से जोड़ने वाला कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था। अदालत ने कहा कि केवल जांच के नाम पर किसी नागरिक को अनिश्चितकाल तक आर्थिक संकट में नहीं डाला जा सकता।
अदालत ने खाते से रोक हटाने का दिया आदेश
उच्च न्यायालय ने बैंक को निर्देश दिया कि खाते पर लगी रोक तत्काल प्रभाव से हटाई जाए। अदालत ने कहा कि संबंधित एजेंसी खाते को फ्रीज रखने के लिए कोई ठोस कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी। न्यायालय के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ न प्राथमिकी दर्ज हो, न कोई औपचारिक आरोप हो और न ही न्यायिक आदेश, तो उसका बैंक खाता फ्रीज रखना कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
बिना उचित आधार कार्रवाई को बताया मनमाना
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता का पैसा लंबे समय से खाते में फंसा हुआ था, जबकि उसके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष आपराधिक मामला दर्ज नहीं था। न्यायालय ने इसे मनमानी कार्रवाई करार देते हुए कहा कि इस प्रकार का कदम व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है। अदालत ने यह भी दोहराया कि जांच एजेंसियों को कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई करनी चाहिए।
जांच में सहयोग करने का भी दिया निर्देश
हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को यह निर्देश भी दिया कि वह संबंधित जांच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग करे। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी मामले में जांच जारी है तो संबंधित व्यक्ति का सहयोग आवश्यक है, लेकिन केवल जांच के नाम पर उसके आर्थिक अधिकारों को अनिश्चितकाल तक बाधित नहीं किया जा सकता। इस फैसले को बैंक खातों को लेकर नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
साइबर जांच और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल लेन-देन और साइबर अपराधों के बढ़ते मामलों के बीच यह फैसला बेहद अहम संदेश देता है। अदालत ने एक ओर जांच एजेंसियों की भूमिका को स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया कि किसी नागरिक की आर्थिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए मजबूत कानूनी आधार होना अनिवार्य है। यह आदेश भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक उदाहरण माना जा सकता है।