कोलकाता डेस्क: भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति अब E20 तक पहुंच चुकी है, लेकिन सरकार की योजना यहीं रुकने वाली नहीं है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाई-एथेनॉल फ्यूल और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को लेकर भारत के अगले चरण की दिशा साफ की है। जून 2026 में E100 ईंधन के इस्तेमाल के लिए नियामकीय मंजूरी की घोषणा की गई, जिससे ऐसे वाहनों के लिए रास्ता खुला है जो E20 से लेकर E100 तक अलग-अलग एथेनॉल मिश्रण पर चल सकें।
E20 के बाद E100 क्यों अहम है?
E20 पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल और बाकी पेट्रोल होता है। भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग का स्तर 2025-26 में 20 प्रतिशत तक पहुंच गया है। पेट्रोल में एथेनॉल के इस्तेमाल को बढ़ाने के पीछे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू स्तर पर तैयार ईंधन को बढ़ावा देना और किसानों के लिए एथेनॉल आधारित बाजार का विस्तार करना प्रमुख लक्ष्य हैं।
अब सरकार हाई-एथेनॉल फ्यूल की तरफ बढ़ रही है। E100 इसी दिशा का अगला चरण है। हालांकि E100 नाम के बावजूद व्यावसायिक ईंधन की वास्तविक संरचना संबंधित ईंधन मानकों पर निर्भर करती है। इसका इस्तेमाल ऐसे इंजन और फ्यूल सिस्टम में किया जाता है जिन्हें ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधन के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया हो।
फ्लेक्स-फ्यूल इंजन में क्या खास होगा?
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन सामान्य पेट्रोल कारों से अलग तकनीक पर काम करते हैं। इनमें इंजन और फ्यूल सिस्टम को इस तरह तैयार किया जाता है कि वाहन अलग-अलग अनुपात वाले पेट्रोल-एथेनॉल मिश्रण के मुताबिक अपनी इंजन सेटिंग को एडजस्ट कर सके। ऐसे वाहनों की क्षमता मॉडल और प्रमाणन के आधार पर E20 से लेकर E85 या E100 तक हो सकती है।
इसका मतलब यह है कि भविष्य में वाहन चलाने के लिए केवल एक निश्चित ब्लेंड पर निर्भरता कम हो सकती है। हालांकि E20 के लिए बने सामान्य वाहनों में सीधे E100 भरना सुरक्षित नहीं माना जा सकता। ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधन के लिए इंजन कैलिब्रेशन, फ्यूल लाइन, सील, गैस्केट और दूसरे कंपोनेंट में जरूरी बदलाव करने पड़ते हैं।
कंपनियां भी तैयार कर रहीं फ्लेक्स-फ्यूल वाहन
भारत में इस तकनीक को लेकर ऑटोमोबाइल कंपनियों की गतिविधियां बढ़ी हैं। जून 2026 में मारुति सुजुकी की फ्लेक्स-फ्यूल पैसेंजर कार पेश की गई, जबकि हीरो मोटोकॉर्प ने भी हाई-एथेनॉल फ्यूल पर चलने वाली मोटरसाइकिल तकनीक प्रदर्शित की है। सरकार की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि कई बड़ी वाहन कंपनियां E100-compatible मॉडल तैयार कर रही हैं।
नए E100 नियमों से कंपनियों को ऐसे वाहनों के विकास और व्यावसायिक लॉन्च के लिए नियामकीय ढांचा मिलेगा। हालांकि बड़े स्तर पर इन वाहनों की उपलब्धता केवल नियमों पर निर्भर नहीं करेगी। वाहन की कीमत, फ्यूल की उपलब्धता, पेट्रोल पंपों पर इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्राहकों की स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
पेट्रोल पंपों पर भी बदलना होगा सिस्टम
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सिर्फ इंजन तकनीक बदलना पर्याप्त नहीं होगा। ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधन की बिक्री के लिए अलग स्टोरेज और डिस्पेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी। सरकार ने फ्लेक्स-फ्यूल इकोसिस्टम विकसित करने के लिए शुरुआती चरण में दिल्ली-NCR और मुंबई-पुणे-नागपुर कॉरिडोर जैसे क्षेत्रों में आउटलेट बढ़ाने की योजना बताई है। दिसंबर 2026 तक करीब 500 और 2027 के अंत तक प्रमुख शहरों में लगभग 5,000 फ्लेक्स-फ्यूल तैयार आउटलेट का प्रस्ताव रखा गया है।
किसानों और तेल आयात पर भी असर
सरकार एथेनॉल आधारित फ्यूल को केवल ऑटोमोबाइल सेक्टर की तकनीकी बदलाव के तौर पर नहीं देख रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में एथेनॉल उत्पादन क्षमता 2014 के करीब 421 करोड़ लीटर से बढ़कर 2026 में लगभग 2,000 करोड़ लीटर हो गई है। सरकार का मानना है कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल बढ़ने से घरेलू एथेनॉल की मांग बढ़ेगी और इससे किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर बन सकते हैं।
फिलहाल भारत का फोकस E20 से आगे बढ़कर ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधन और फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक के लिए पूरा इकोसिस्टम तैयार करने पर है। यानी आने वाले वर्षों में गाड़ियों की तकनीक के साथ-साथ पेट्रोल पंप, ईंधन आपूर्ति और वाहन निर्माण का पूरा सिस्टम भी धीरे-धीरे बदल सकता है।