नई दिल्ली. बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य और आधुनिक युद्ध की नई चुनौतियों को देखते हुए भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को लगातार उन्नत बनाने की दिशा में कार्य कर रहा है। इसी क्रम में देश ने स्वदेशी स्ट्रैटोस्फेरिक एयरशिप विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम तेज कर दिया है। इस परियोजना का उद्देश्य ऐसा उच्च प्रौद्योगिकी आधारित हवाई मंच तैयार करना है, जो पारंपरिक ड्रोन और उपग्रहों के बीच की परिचालन क्षमता को पूरा करते हुए सीमाओं पर चौबीसों घंटे निगरानी रख सके। भारतीय वायुसेना के परिचालन निदेशालय की निगरानी में आगे बढ़ रही इस परियोजना को देश की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रणाली भविष्य के नेटवर्क आधारित युद्ध और वास्तविक समय की खुफिया निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
20 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर महीनों तक तैनाती की होगी क्षमता
प्रस्तावित एयरशिप को इस प्रकार विकसित किया जा रहा है कि वह लगभग 20 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में सक्रिय रह सके। पारंपरिक विमानों और अधिकांश ड्रोन की तुलना में यह प्रणाली कहीं अधिक समय तक लगातार निगरानी करने में सक्षम होगी। इसमें उच्च क्षमता वाले प्रकाशीय सेंसर, उन्नत रडार प्रणाली तथा इलेक्ट्रॉनिक खुफिया उपकरण लगाए जाने की योजना है। इन अत्याधुनिक प्रणालियों की सहायता से सीमावर्ती क्षेत्रों में संदिग्ध गतिविधियों की वास्तविक समय में निगरानी, सैन्य गतिविधियों का विश्लेषण तथा लंबी दूरी तक सुरक्षित संचार स्थापित किया जा सकेगा। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह क्षमता सीमाई सुरक्षा को नई मजबूती देने के साथ सैन्य निर्णय प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी बनाएगी।
'एएस-एचएपीएस' परियोजना को मिलेगा सरकारी सहयोग, अनुसंधान पर होगा बड़ा निवेश
इस महत्वाकांक्षी परियोजना को 'एयरशिप आधारित उच्च ऊंचाई छद्म उपग्रह' अर्थात AS-HAPS नाम दिया गया है। इसे रक्षा मंत्रालय की 'मेक फर्स्ट' नीति के अंतर्गत विकसित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना है। योजना के अनुसार चयनित निजी कंपनियों को अनुसंधान एवं विकास लागत का लगभग 70 प्रतिशत तक वित्तीय सहयोग प्रदान किया जा सकता है। फरवरी में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने इस परियोजना को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान की थी। इसकी अनुमानित कुल लागत लगभग 15,000 करोड़ रुपये आंकी गई है, जिसमें अनुसंधान, विकास और सीमित संख्या में प्रणालियों की खरीद भी शामिल है। इस निवेश से देश में उच्च स्तरीय रक्षा अनुसंधान को नई गति मिलने की उम्मीद है।
ड्रोन और उपग्रह के बीच बनेगा रणनीतिक निगरानी मंच
नई प्रणाली को इस प्रकार डिजाइन किया जा रहा है कि यह उच्च ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन और निम्न पृथ्वी कक्षा में संचालित उपग्रहों के बीच की परिचालन आवश्यकता को पूरा कर सके। जहां उच्च ऊंचाई वाले ड्रोन सीमित अवधि तक उड़ान भर सकते हैं और उपग्रह निर्धारित कक्षाओं में लगातार गतिशील रहते हैं, वहीं यह एयरशिप लंबे समय तक एक निश्चित क्षेत्र में स्थिर रहकर लगातार निगरानी कर सकेगा। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों, समुद्री इलाकों और सामरिक महत्व के स्थानों पर वास्तविक समय में सूचनाएं प्राप्त करना अधिक आसान होगा। इसके अतिरिक्त संचार नेटवर्क को मजबूत करने और आपातकालीन परिस्थितियों में वैकल्पिक संचार मंच उपलब्ध कराने में भी यह तकनीक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
निजी कंपनियों के लिए बड़ा अवसर, रक्षा विनिर्माण को मिलेगा नया प्रोत्साहन
रक्षा मंत्रालय ने इस परियोजना के लिए देश की अनेक निजी एयरोस्पेस कंपनियों से संपर्क किया है। तकनीकी दक्षता, अनुसंधान क्षमता और वित्तीय मजबूती के आधार पर कम से कम दो कंपनियों का चयन किए जाने की संभावना है। यद्यपि अभी तक किसी भारतीय निजी कंपनी ने इस स्तर की तकनीक का व्यावहारिक प्रदर्शन नहीं किया है, फिर भी सरकारी वित्तीय सहयोग और दीर्घकालिक परियोजना के कारण रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से देश में उच्च प्रौद्योगिकी आधारित रक्षा उद्योग का विस्तार होगा और स्वदेशी नवाचार को भी नई दिशा मिलेगी।
डीआरडीओ के अनुभव से मिलेगी मजबूती, भविष्य में तैयार होगा स्वदेशी निगरानी नेटवर्क
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन पहले से ही इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण परीक्षण कर चुका है। मई 2025 में मध्य प्रदेश में लगभग 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक एयरशिप उड़ाकर प्रौद्योगिकी का सफल परीक्षण किया गया था, जिसमें वैज्ञानिक उपकरणों से युक्त पेलोड का उपयोग किया गया था। इसके साथ ही रक्षा मंत्रालय स्थिर पंखों वाले उच्च ऊंचाई मंच के विकास पर भी कार्य कर रहा है, जो लंबी दूरी के अभियानों को अंजाम देने में सक्षम होगा। इन सभी प्रयासों का उद्देश्य अंतरिक्ष और वायुमंडल के बीच ऐसी स्वदेशी निगरानी प्रणाली विकसित करना है, जो सीमा सुरक्षा, खुफिया अभियानों, सैन्य संचार और सामरिक तैयारियों को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप नई मजबूती प्रदान कर सके।