केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने इस नीति के अमल पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने नई याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 22 जुलाई की तारीख तय की है। सुप्रीम कोर्ट की CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी भाषा को सीखना कभी नुकसानदायक नहीं होता। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना संविधान के उद्देश्यों में शामिल है।
क्या है CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी?
CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी के तहत छात्रों को तीन भाषाएं पढ़ने का प्रावधान है। इस नीति का उद्देश्य छात्रों को एक से ज्यादा भाषाओं का ज्ञान देना और भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नई व्यवस्था के अनुसार कक्षा 9 से छात्रों को दो भारतीय भाषाएं पढ़नी पड़ सकती हैं। इससे छात्रों के लिए पहले से पढ़ी जा रही भाषाओं को जारी रखना मुश्किल हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से क्यों किया इनकार?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने CBSE के सर्कुलर पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। कोर्ट का कहना था कि भाषा सीखना हमेशा लाभदायक होता है। जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना एक संवैधानिक उद्देश्य है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि नीति में इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों पर दोबारा विचार करने की जरूरत हो सकती है।
याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी?
थ्री लैंग्वेज पॉलिसी के खिलाफ दाखिल याचिकाओं में कई सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर ने कहा कि CBSE के पास ऐसी शैक्षणिक नीति तय करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि यह अधिकार NCERT के पास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि CBSE का सर्कुलर बिना पर्याप्त कानूनी आधार के जारी किया गया है और छात्रों पर भाषा का विकल्प थोपने जैसा है।
भाषा चुनने की आजादी को लेकर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में कहा कि छात्रों को अपनी पसंद की भाषा चुनने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई छात्र संस्कृत की जगह पंजाबी या कोई दूसरी भाषा सीखना चाहता है, तो कई जगहों पर उसके लिए पर्याप्त शिक्षक और किताबें उपलब्ध नहीं हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह भी चिंता जताई कि नई नीति लागू होने पर छात्रों को रोजगार और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से भाषा चुनने में परेशानी हो सकती है।
अंग्रेजी को लेकर भी उठी बहस
सुनवाई के दौरान अंग्रेजी भाषा की स्थिति को लेकर भी चर्चा हुई। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि नई नीति में अंग्रेजी को गैर-मूल (Non-Native) भाषा माना गया है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि "मूल भारतीय भाषा" की परिभाषा क्या होगी? उन्होंने कहा कि भारत में समय के साथ कई भाषाओं का प्रशासन और समाज में इस्तेमाल हुआ है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कभी फारसी अदालतों की आधिकारिक भाषा हुआ करती थी।
क्या भारत अंग्रेजी को भारतीय भाषा मान सकता है?
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या भारत अंग्रेजी को एक देसी भारतीय भाषा मान सकता है? उन्होंने कहा कि भाषा का मुद्दा केवल पहचान से जुड़ा नहीं है, बल्कि शिक्षा और समाज से भी जुड़ा है। कोर्ट ने माना कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन नीति को लागू करने के तरीके पर विचार किया जा सकता है।
सरकार और CBSE का उद्देश्य क्या है?
थ्री लैंग्वेज पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य छात्रों को बहुभाषी शिक्षा देना और भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ाना है। शिक्षा नीति के समर्थकों का मानना है कि एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान छात्रों की सोचने और सीखने की क्षमता को बढ़ाता है।
नीति के विरोध में क्या चिंता है?
विरोध करने वालों का कहना है कि देश के अलग-अलग राज्यों में भाषा की स्थिति अलग है। ऐसे में एक समान भाषा नीति लागू करने में व्यावहारिक समस्याएं आ सकती हैं।
मुख्य चिंताएं हैं:
- छात्रों पर अतिरिक्त भाषा का दबाव बढ़ना।
- पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता।
- अलग-अलग क्षेत्रों में भाषाई विकल्पों की कमी।
- छात्रों की पसंद और भविष्य की जरूरतों का सवाल।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर रोक नहीं लगाई है। हालांकि, कोर्ट ने नई याचिकाओं पर नोटिस जारी किया है और मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी। अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर हैं, जहां कोर्ट नीति के कानूनी आधार और इसके लागू करने के तरीके पर आगे विचार करेगा।
निष्कर्ष
CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम रुख साफ है कि फिलहाल नीति पर रोक नहीं लगेगी। अदालत ने भाषा सीखने के महत्व को स्वीकार किया है, लेकिन साथ ही नीति के क्रियान्वयन और छात्रों के अधिकारों से जुड़े सवालों पर आगे सुनवाई जारी रहेगी।