कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के निधन पर केंद्र की चुप्पी को “अस्पष्ट और चिंताजनक” करार दिया है। उनका कहना है कि जिस प्रकार सरकार ने इस संवेदनशील घटना पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, उससे भारत की विदेश नीति की विश्वसनीयता पर गम्भीर संदेह उत्पन्न होता है। उनके अनुसार ऐसे अवसरों पर भारत का संतुलित और स्पष्ट रुख अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
भाजपा का पलटवार: 2011 में लीबिया पर कांग्रेस क्यों मौन थी?
भाजपा ने सोनिया गांधी के आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी का कहना है कि वर्ष 2011 में जब लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी की नाटो अभियानों के दौरान हत्या हुई थी, उस समय केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार कर रही थी। भारत और लीबिया के बीच उस समय घनिष्ठ सम्बन्ध थे, फिर भी न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया गया और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी गई। भाजपा ने पूछा कि यदि उस समय कांग्रेस मौन रही, तो आज नैतिकता और सभ्यतागत सम्बन्धों की दुहाई देना कितना उचित है।
विदेश नीति पर दोहरे मानदंड?
भाजपा के तर्क के बाद राजनीतिक विमर्श इस प्रश्न पर केन्द्रित हो गया है कि क्या विदेश नीति को दलगत सुविधा के आधार पर परिभाषित किया जाना चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने एक महत्वपूर्ण वैश्विक घटना पर सामयिक प्रतिक्रिया नहीं दी, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि इसी प्रकार के मौन को कांग्रेस ने अतीत में अपनाया था। यह बहस अब इस दिशा में आगे बढ़ रही है कि क्या विदेश नीति में निरंतरता और संतुलन सर्वोपरि होना चाहिए या उसे राजनीतिक संदर्भों के हिसाब से बदलना उचित है।
पश्चिम एशिया में भारतीय समुदाय की सुरक्षा बड़ी चिंता
वर्तमान परिस्थिति में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भारत के लगभग नब्बे लाख नागरिक प्रभावित हो सकते हैं। यह क्षेत्र भारतीयों के रोजगार, आर्थिक स्थिरता और पारिवारिक जीवन से सीधे जुड़ा है। विशेष रूप से केरल से गए लोगों की बड़ी संख्या वहाँ रह रही है। कुछ इलाक़ों में परीक्षाएँ स्थगित होने की खबरें आईं, जिससे विद्यार्थियों के शैक्षणिक कार्यक्रम प्रभावित हुए। ऊर्जा, व्यापार और समुद्री परिवहन से जुड़े भारतीय पेशेवर भी जोखिम की स्थिति में हैं। ऐसे माहौल में भारत सरकार के प्रत्येक बयान का सीधा प्रभाव प्रवासी भारतीयों के जीवन पर पड़ सकता है।
क्या चुप्पी रणनीति हो सकती है?
राजनयिक हलकों का मत है कि कई बार संवेदनशील परिस्थितियों में प्रतिक्रिया रोक कर रखना भी नीति का हिस्सा होता है। जब किसी क्षेत्र में तनाव अत्यधिक बढ़ा हो और वहाँ बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रह रहे हों, तब कोई भी जल्दबाज़ी या कठोर टिप्पणी स्थिति को और जटिल बना सकती है। सरकार का दावा है कि वह परिस्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण कर रही है और हर कदम प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा को प्राथमिकता में रखकर उठाया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि चुप्पी से भ्रम पैदा होता है, जबकि सत्ता पक्ष का तर्क है कि संयमित प्रतिक्रिया ही संकट काल में सही मार्ग होती है।
बहस का मूल प्रश्न: विदेश नीति का मानक क्या हो?
इस संपूर्ण विवाद का केंद्र यही है कि क्या विदेश नीति को राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए या दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय किया जाना चाहिए। एक ओर कांग्रेस पारदर्शिता और औपचारिक प्रतिक्रिया पर ज़ोर दे रही है, दूसरी ओर भाजपा कह रही है कि राष्ट्रीय हितों, विशेषकर प्रवासी समुदाय की सुरक्षा, किसी भी राजनीतिक बयानबाज़ी से ऊपर है। यह बहस आने वाले समय में भारत की कूटनीति की दिशा और स्वर को निश्चित रूप से प्रभावित करेगी।
Comments (0)