बेंगलुरु: कर्नाटक में कथित अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान के लिए चल रहे पुलिस सत्यापन अभियान ‘ऑपरेशन मुक्ता’ और मतदाता सूची की Special Intensive Revision (SIR)-2026 प्रक्रिया के बीच नागरिकता और पहचान को लेकर बहस तेज हो गई है। पुलिस की कार्रवाई में कुछ ऐसे लोगों के हिरासत में लिए जाने के मामले सामने आए हैं, जिनके पास आधार कार्ड या मतदाता पहचान पत्र जैसे भारतीय दस्तावेज मौजूद थे। हालांकि, केवल इन दस्तावेजों के आधार पर किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता अंतिम रूप से साबित नहीं होती। दूसरी ओर, नागरिक अधिकार समूहों का सवाल है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम लंबे समय तक मतदाता सूची में रहा है और उसने चुनावों में मतदान भी किया है, तो बाद में उसके विदेशी नागरिक होने के संदेह की जांच किस प्रक्रिया और मानक के तहत की जा रही है।
ऑपरेशन मुक्ता में बड़े पैमाने पर दस्तावेजों की जांच
बेंगलुरु पुलिस ने अगस्त में ‘ऑपरेशन मुक्ता’ के तहत शहर के कई इलाकों में विदेशी नागरिकों की पहचान के लिए व्यापक सत्यापन अभियान चलाया। इलेक्ट्रॉनिक सिटी डिविजन में ही पुलिस ने करीब 1,900 से अधिक लोगों के दस्तावेजों की जांच की और कुछ लोगों को बांग्लादेशी नागरिक के रूप में चिन्हित किया। व्हाइटफील्ड और इलेक्ट्रॉनिक सिटी में चलाए गए अभियान में आधार कार्ड, वोटर आईडी, पासपोर्ट, वीजा और अन्य दस्तावेजों की जांच की गई। पुलिस का कहना है कि जिन लोगों के दस्तावेजों से उनकी विदेशी नागरिकता सामने आती है, उनके मामलों को Foreigners Regional Registration Office (FRRO) के समक्ष भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रीयता और दस्तावेजों की जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाती है। इसी अभियान के तहत हाल में 31 बांग्लादेशी नागरिकों को सत्यापन और FRRO से संबंधित प्रक्रिया के बाद बेंगलुरु से पश्चिम बंगाल के मालदा भेजा गया, जहां से उनके प्रत्यावर्तन की कार्रवाई की जानी है।
वोटर आईडी और आधार होने से नागरिकता साबित होती है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए भारतीय नागरिक होना आवश्यक है, जैसा कि चुनाव आयोग के आधिकारिक FAQ में स्पष्ट किया गया है। लेकिन किसी व्यक्ति के पास वोटर आईडी या आधार कार्ड होना अपने-आप में उसकी नागरिकता का अंतिम और अचूक प्रमाण नहीं माना जाता। इसलिए यदि जांच एजेंसियों को किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता पर संदेह है, तो वे अन्य दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर उसकी नागरिकता की जांच कर सकती हैं। यही वजह है कि किसी व्यक्ति के पास भारतीय पहचान दस्तावेज मिलने और उसके विदेशी नागरिक होने के संदेह—दोनों को अलग-अलग कानूनी सवालों के रूप में देखा जाता है।
SIR प्रक्रिया को लेकर भी उठ रहे सवाल
कर्नाटक में SIR-2026 को लेकर पहले से ही राजनीतिक और नागरिक समाज की बहस चल रही है। चुनाव आयोग ने SIR के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए घर-घर सत्यापन और दस्तावेजों की प्रक्रिया शुरू की है। आयोग के पोर्टल पर SIR-2026 के लिए नाम खोजने, दस्तावेज जमा करने और दावे-आपत्तियां दर्ज कराने की सुविधाएं उपलब्ध हैं। 1 सितंबर को बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में SIR के खिलाफ ‘Election Commission Chalo’ मार्च भी हुआ, जिसमें अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश राज समेत कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण की पारदर्शिता और प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। हालांकि, SIR में किसी व्यक्ति का नाम बने रहना या उसका सत्यापन होना अपने-आप में पुलिस या किसी अन्य एजेंसी की अलग नागरिकता जांच को रोकता है—ऐसा निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं होगा।
कर्नाटक में पहले भी सामने आया नागरिकता विवाद
कर्नाटक में नागरिकता और कथित बांग्लादेशी नागरिक होने के आरोप को लेकर एक अन्य मामला भी अदालत तक पहुंच चुका है। जुलाई 2026 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल के एक व्यक्ति की नागरिकता सत्यापन में देरी को लेकर राज्य सरकार पर सवाल उठाए थे। वह व्यक्ति बेंगलुरु में कथित बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया था और उसने भारतीय नागरिक होने का दावा किया था। उसके पक्ष में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की कुछ रिपोर्टों का भी उल्लेख अदालत में किया गया। यह मामला दिखाता है कि किसी व्यक्ति के पास मौजूद दस्तावेजों और उसकी वास्तविक राष्ट्रीयता के बीच विवाद होने पर अंतिम स्थिति तय करने में प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।
फर्जी दस्तावेजों का आरोप भी जांच का हिस्सा
पुलिस का पक्ष है कि कुछ विदेशी नागरिक कथित तौर पर फर्जी या गलत पहचान वाले दस्तावेजों के जरिए भारत में रहने में सफल रहे हो सकते हैं। ऑपरेशन मुक्ता के दौरान पुलिस ने ऐसे लोगों के दस्तावेजों की जांच की और संदिग्ध मामलों को आगे की सत्यापन प्रक्रिया के लिए भेजा। हालांकि, किसी व्यक्ति के पास आधार या वोटर आईडी होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दस्तावेज फर्जी हैं। इसके लिए संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, जारी करने की प्रक्रिया और व्यक्ति की राष्ट्रीयता की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
SIR में नाम रहने और पुलिस जांच के बीच क्या अंतर है?
दोनों प्रक्रियाओं का उद्देश्य और कानूनी आधार अलग है। SIR चुनावी सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया है, जबकि पुलिस का विदेशी नागरिक सत्यापन अभियान किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता और भारत में उसके रहने की वैधता की जांच से जुड़ा है।इसलिए किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में होना एक महत्वपूर्ण तथ्य जरूर हो सकता है, लेकिन यह अपने-आप में नागरिकता विवाद का अंतिम फैसला नहीं है। इसी तरह पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को संदिग्ध मानकर हिरासत में लेना भी उसे स्वतः विदेशी नागरिक साबित नहीं करता। अंतिम स्थिति संबंधित दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड, जांच और जरूरत पड़ने पर न्यायिक प्रक्रिया से तय होगी।
अब आगे क्या होगा?
जिन लोगों की राष्ट्रीयता को लेकर पुलिस को संदेह है, उनके दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच जारी रह सकती है। यदि जांच में विदेशी नागरिकता की पुष्टि होती है, तो संबंधित कानूनों और FRRO की प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, यदि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक होने के पर्याप्त दस्तावेज पेश करता है, तो उसके मामले में उसी आधार पर निर्णय लिया जाना होगा। इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या किसी व्यक्ति की वर्षों पुरानी मतदाता पहचान और मतदान का रिकॉर्ड तथा बाद की नागरिकता जांच के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है? कर्नाटक में SIR और पुलिस सत्यापन के समानांतर चलने के कारण आने वाले दिनों में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो सकता है।