प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के सूरत के निकट हजीरा स्थित एलएंडटी के अत्याधुनिक रक्षा उत्पादन केंद्र का दौरा कर स्वदेशी लाइट टैंक ‘जोरावर’ का जायजा लिया। यह दौरा भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और स्वदेशी सैन्य तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। इससे पहले भी प्रधानमंत्री इसी संयंत्र में निर्मित के-9 वज्र स्वचालित तोप प्रणाली का अवलोकन कर चुके हैं। अब ‘जोरावर’ टैंक के निरीक्षण ने इस परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है।
डीआरडीओ और निजी उद्योग की साझेदारी का बड़ा उदाहरण
‘जोरावर’ टैंक का विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और निजी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी एलएंडटी के सहयोग से किया गया है। यह परियोजना भारत में रक्षा निर्माण के बदलते स्वरूप को दर्शाती है, जहां सरकारी अनुसंधान संस्थान और निजी उद्योग मिलकर आधुनिक सैन्य उपकरण तैयार कर रहे हैं। वर्ष 2024 में इसका प्रोटोटाइप पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आया था और तब से इसके विभिन्न चरणों के परीक्षण जारी हैं। यह परियोजना आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में देश की बढ़ती तकनीकी क्षमता का प्रतीक बन चुकी है।
हल्का लेकिन बेहद ताकतवर है ‘जोरावर’
‘जोरावर’ टैंक की सबसे बड़ी विशेषता इसका हल्का वजन है। इसका कुल वजन लगभग 25 टन है, जो भारतीय सेना के वर्तमान मुख्य युद्धक टैंकों की तुलना में लगभग आधा माना जाता है। कम वजन होने के कारण इसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों, संकरे पहाड़ी रास्तों और दुर्गम इलाकों में आसानी से तैनात किया जा सकता है। पूर्वी लद्दाख जैसे क्षेत्रों में जहां भारी टैंकों की तैनाती चुनौतीपूर्ण होती है, वहां ‘जोरावर’ भारतीय सेना को महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्रदान कर सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ड्रोन तकनीक से लैस
आधुनिक युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ‘जोरावर’ में उन्नत तकनीकों को शामिल किया गया है। यह टैंक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों, आधुनिक सेंसरों और ड्रोन तकनीक के साथ विकसित किया जा रहा है। इसके जरिए युद्धक्षेत्र में बेहतर निगरानी, लक्ष्य पहचान और त्वरित प्रतिक्रिया संभव हो सकेगी। इसके अलावा इसमें एंटी एयरक्राफ्ट क्षमता भी उपलब्ध होगी, जिससे यह हवाई खतरों का मुकाबला करने में सक्षम बनेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के नेटवर्क-केंद्रित युद्ध में इस तरह की तकनीकें निर्णायक भूमिका निभाएंगी।
नदी-नालों को पार करने में सक्षम एम्फीबियस प्लेटफॉर्म
‘जोरावर’ की एक और विशेषता इसकी एम्फीबियस क्षमता है। इसका अर्थ है कि यह टैंक जल बाधाओं को पार करने में सक्षम होगा। पर्वतीय क्षेत्रों में अक्सर नदियां, छोटे जलमार्ग और कठिन भूभाग सैन्य गतिविधियों में बाधा बनते हैं। ऐसे में यह क्षमता सेना की गतिशीलता को काफी बढ़ा सकती है। तेज गति से स्थान परिवर्तन और कठिन इलाकों में संचालन की क्षमता इसे पारंपरिक टैंकों से अलग बनाती है।
लद्दाख और रेगिस्तान में चल रहे हैं कठिन परीक्षण
डीआरडीओ के अनुसार ‘जोरावर’ के व्यापक परीक्षण विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में किए जा रहे हैं। इसके तहत गर्मियों और सर्दियों दोनों मौसमों में इसकी क्षमता का परीक्षण किया जा रहा है। इसके अलावा रेगिस्तानी क्षेत्रों और लद्दाख जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में भी इसके प्रदर्शन का आकलन किया जा रहा है। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि टैंक किसी भी मौसम और युद्धक्षेत्र में प्रभावी ढंग से कार्य कर सके। परीक्षणों के सफल होने के बाद रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना इसकी खरीद प्रक्रिया को अंतिम रूप देंगे।
भारतीय सेना को अगले वर्ष मिल सकता है पहला बैच
वर्तमान योजना के अनुसार भारतीय सेना को वर्ष 2027 तक ‘जोरावर’ टैंक की पहली खेप प्राप्त हो सकती है। शुरुआती चरण में सेना लगभग 59 लाइट टैंकों की खरीद की योजना पर काम कर रही है। हालांकि दीर्घकालिक आवश्यकता इससे कहीं अधिक है और सेना को कुल 354 लाइट टैंकों की जरूरत बताई गई है। यदि यह परियोजना सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है।
वीर योद्धा जोरावर सिंह के नाम पर रखा गया नाम
इस आधुनिक युद्धक वाहन का नाम 19वीं शताब्दी के प्रसिद्ध डोगरा सैन्य जनरल जोरावर सिंह के सम्मान में रखा गया है। उन्हें भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे साहसी और कुशल सेनानायकों में गिना जाता है। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में अनेक सफल सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में अपनी रणनीतिक क्षमता का परिचय दिया। सेना का मानना है कि उनके नाम पर रखा गया यह टैंक भी कठिनतम परिस्थितियों में देश की सुरक्षा का मजबूत प्रहरी बनेगा।
सीमाओं पर भारत की ताकत बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम
‘जोरावर’ केवल एक नया टैंक नहीं, बल्कि भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता, तकनीकी नवाचार और सामरिक तैयारी का प्रतीक बनकर उभर रहा है। पूर्वी लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इसकी संभावित तैनाती भारतीय सेना की परिचालन क्षमता को नई मजबूती दे सकती है। प्रधानमंत्री के दौरे ने यह भी संकेत दिया है कि सरकार स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रही है और भविष्य के युद्धक्षेत्रों के लिए आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म तैयार करने पर विशेष ध्यान दे रही है।