Rajasthan Weather Update: राजस्थान में इस साल मानसून को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। मौसम विशेषज्ञों की नजर अब अल-नीनो (El Niño) की सक्रियता पर है, जिसका असर प्रदेश के कई जिलों में बारिश पर पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने भी राजस्थान को उन 12 राज्यों में शामिल किया है, जहां अल-नीनो के कारण खरीफ सीजन के दौरान सूखे का खतरा बना हुआ है। सबसे ज्यादा जोखिम जयपुर, नागौर, जोधपुर, बाड़मेर, चूरू, बीकानेर, जैसलमेर, पाली और सीकर जैसे जिलों में माना गया है। इन जिलों की खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। यदि जुलाई और विशेष रूप से सितंबर में सामान्य से कम बारिश होती है तो इसका सीधा असर फसलों, भूजल स्तर और पेयजल व्यवस्था पर पड़ सकता है। यही कारण है कि राज्य और केंद्र सरकार ने कृषि विभाग को पहले से तैयारी करने के निर्देश दिए हैं।
क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ जाती है सूखे की आशंका?
अल-नीनो एक वैश्विक जलवायु प्रणाली (Climate Pattern) है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। भारत में अल-नीनो के सक्रिय होने पर अक्सर मानसून कमजोर पड़ जाता है, जिससे कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज होती है। राजस्थान जैसे राज्य, जहां पहले से ही जल संकट और कम वर्षा की चुनौती रहती है, वहां अल-नीनो का प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक सितंबर के मानसून को इस बार बेहद अहम मान रहे हैं।
इन 9 जिलों में सबसे ज्यादा खतरा
केंद्र सरकार की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के जिन जिलों में सूखे की आशंका अधिक जताई गई है, उनमें शामिल हैं—
जयपुर
नागौर
जोधपुर
बाड़मेर
चूरू
बीकानेर
जैसलमेर
पाली
सीकर
इन क्षेत्रों में खरीफ की खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर रहती है। यदि मानसून कमजोर रहा तो किसानों की लागत बढ़ सकती है और उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
जलाशयों की स्थिति फिलहाल राहत देने वाली
हालांकि बारिश को लेकर चिंता बनी हुई है, लेकिन जल भंडारण के मामले में फिलहाल स्थिति कुछ राहत देने वाली है। केंद्रीय जल आयोग की 18 जून तक की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के सात प्रमुख जलाशयों में 2.174 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी उपलब्ध है। यह दीर्घकालिक औसत 1.841 BCM से करीब 18.09 प्रतिशत अधिक है। हालांकि पिछले वर्ष इसी अवधि में जलाशयों में 2.940 BCM पानी मौजूद था, इसलिए इस बार जल भंडारण में गिरावट भी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले हफ्तों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो जलाशयों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
कौन-कौन से बांध अच्छी स्थिति में हैं?
जलाशयों के आंकड़ों के अनुसार-
बीसलपुर बांध लगभग 68.63% क्षमता के साथ सबसे बेहतर स्थिति में है।
सोम-कमला-अंबा परियोजना में 61.38% पानी उपलब्ध है।
जाखम बांध लगभग 47.83% क्षमता पर है।
माही बजाज सागर और जवाई बांध भी फिलहाल सामान्य स्थिति में बने हुए हैं।
वहीं सबसे अधिक चिंता राणा प्रताप सागर बांध को लेकर है, जहां पिछले वर्ष इसी समय जलभराव 94.10% था, जो इस बार घटकर केवल 34.78% रह गया है।
कृषि विभाग ने तैयार किया कंटीजेंसी प्लान
संभावित सूखे से निपटने के लिए कृषि विभाग ने जिला स्तर पर कृषि आकस्मिकता (Contingency) योजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। योजना के तहत किसानों को ऐसी फसलें बोने की सलाह दी जा रही है, जिन्हें कम पानी की जरूरत होती है। इनमें प्रमुख रूप से-
बाजरा
मूंग
उड़द
ग्वार
तिल
जैसी फसलें शामिल हैं। इसके अलावा यदि मानसून देर से आता है तो वैकल्पिक बुवाई रणनीति भी अपनाई जाएगी, ताकि किसानों का नुकसान कम हो सके।
सितंबर रहेगा सबसे अहम महीना
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगले दो से तीन सप्ताह राजस्थान की खरीफ फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि जुलाई के बाद सितंबर में भी बारिश कमजोर रहती है तो फसलों की पैदावार पर बड़ा असर पड़ सकता है। कम बारिश का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भूजल स्तर, पेयजल आपूर्ति और पशुपालन पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
डीएपी की कमी बनी चुनौती
राज्य में बीज और यूरिया की उपलब्धता फिलहाल पर्याप्त बताई जा रही है, लेकिन किसानों के सामने डीएपी खाद की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है। कृषि विभाग ने केंद्र सरकार से अतिरिक्त डीएपी आवंटन की मांग की है ताकि बुवाई प्रभावित न हो।
कृषि आयुक्त ने क्या कहा?
राजस्थान के कृषि आयुक्त नरेश कुमार गोयल ने बताया कि किसानों के लिए बीज की पर्याप्त व्यवस्था कर दी गई है और यूरिया का भी पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। हालांकि डीएपी की कमी को दूर करने के लिए अतिरिक्त मांग भेजी गई है। उन्होंने कहा कि जून में अच्छी बुवाई होने से फिलहाल राहत मिली है, लेकिन सितंबर में बारिश कम रहने की संभावना को देखते हुए सभी विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।
क्या पड़ सकता है असर?
यदि अल-नीनो का प्रभाव बढ़ता है और मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो राजस्थान में-
खरीफ फसलों का उत्पादन घट सकता है।
किसानों की लागत बढ़ सकती है।
जल संकट गहरा सकता है।
भूजल स्तर में गिरावट आ सकती है।
पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह राजस्थान के मौसम और कृषि दोनों के लिहाज से बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं।