सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI के कामकाज और उसके पुनर्गठन को लेकर बुधवार को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि जब तक नए सिरे से निर्वाचित बार काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन नहीं हो जाता, तब तक BCI के सभी महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के समक्ष रखा जाएगा। इसके साथ ही संबंधित बैठकों में दोनों कानून अधिकारियों को आमंत्रित करने का भी निर्देश दिया गया है। अदालत के इस आदेश को BCI के कामकाज में अंतरिम निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
राज्य बार काउंसिलों को 2 सप्ताह में चुनाव कराने होंगे
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों की चुनावी प्रक्रिया को भी BCI के पुनर्गठन से जोड़ते हुए स्पष्ट समयसीमा तय की है। अदालत ने कहा कि जिन राज्य बार काउंसिलों का नए सिरे से गठन हो चुका है, उन्हें अपनी संरचना अधिसूचित होने की तारीख से 2 सप्ताह के भीतर वैधानिक पदाधिकारियों का चुनाव करना होगा। इसके साथ ही उन्हें बार काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए अपना प्रतिनिधि भी चुनना होगा। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद प्रत्येक राज्य बार काउंसिल को अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी। इन रिपोर्टों के आधार पर अदालत आगे BCI के पुनर्गठन से जुड़े मुद्दे पर विचार करेगी।
BCI के पुनर्गठन का रास्ता राज्य परिषदों से होकर जाएगा
अदालत के निर्देश से यह स्पष्ट हो गया है कि BCI के नए स्वरूप को लेकर आगे की प्रक्रिया राज्य बार काउंसिलों के चुनाव और प्रतिनिधियों के चयन से जुड़ी होगी। राज्य स्तर पर वैधानिक पदाधिकारियों और BCI प्रतिनिधियों का चुनाव पूरा होने के बाद ही पूरे ढांचे को नए सिरे से व्यवस्थित करने की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। इससे BCI में प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही प्रक्रिया को संस्थागत आधार मिलने की उम्मीद है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय व्यापक चुनावी और पुनर्गठन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। इससे संकेत मिलता है कि अदालत का तत्काल ध्यान संस्था की संरचना और उसके कामकाज को व्यवस्थित करने पर है।
चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को हटाने की मांग भी उठी
इस मामले की सुनवाई के दौरान BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को पद से हटाने की मांग भी सामने आई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि BCI के नियमों के अनुसार चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल 2 वर्ष निर्धारित है, लेकिन अप्रैल 2025 में जारी एक अधिसूचना के जरिए इसे बढ़ाकर 5 वर्ष तक कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इस बदलाव के कारण मौजूदा पदाधिकारियों का कार्यकाल 2030 तक बढ़ाने का रास्ता तैयार हुआ। हालांकि, बुधवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया। अदालत ने फिलहाल राज्य बार काउंसिलों की चुनावी प्रक्रिया पूरी कराने और उसके बाद BCI के पुनर्गठन की दिशा में आगे बढ़ने पर ध्यान केंद्रित किया है।
5 साल के कार्यकाल वाली अधिसूचना पर अदालत के सवाल
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने 21 अप्रैल 2025 की उस अधिसूचना का हवाला दिया, जिसके तहत BCI के चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के कार्यकाल को 5 वर्ष तक किए जाने की बात कही गई है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि चेयरमैन का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित करने वाली अधिसूचना किस कानूनी प्रावधान के तहत जारी की गई थी। दीवान ने अदालत को बताया कि BCI Rule 12(2) के अनुसार चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल 2 वर्ष का है। इस पर अदालत ने भी सवाल उठाया कि यदि नियम में कार्यकाल 2 वर्ष निर्धारित है तो किसी अधिसूचना के माध्यम से उसे बढ़ाने का आधार क्या हो सकता है। इन टिप्पणियों से साफ है कि कार्यकाल बढ़ाने वाली अधिसूचना का कानूनी आधार सुनवाई में महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है।
CJI सूर्यकांत ने भी नियम और अधिसूचना के अंतर पर सवाल उठाया
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी सुनवाई के दौरान नियमों में निर्धारित 2 वर्ष की अवधि और अधिसूचना में किए गए 5 वर्ष के प्रावधान के बीच अंतर को लेकर सवाल उठाया। अदालत ने इस मुद्दे पर तत्काल कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है और न ही अधिसूचना की वैधता पर अभी अंतिम फैसला सुनाया गया है। इसका अर्थ है कि कार्यकाल बढ़ाने के निर्णय की कानूनी स्थिति पर आगे सुनवाई हो सकती है। फिलहाल अदालत ने BCI की व्यापक चुनावी और संस्थागत प्रक्रिया को आगे बढ़ाने को प्राथमिकता दी है। इसलिए कार्यकाल विवाद पर अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट के आगामी आदेशों और विस्तृत सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगी।
PEARL Trust को लेकर भी सुनवाई में उठा सवाल
सुनवाई के दौरान BCI द्वारा बनाए गए PEARL Trust का मुद्दा भी अदालत के सामने आया। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने आरोप लगाया कि इस ट्रस्ट में कुछ व्यक्तियों को ऐसे स्थायी प्रबंध न्यासी बनाया गया है, जो BCI की सदस्यता समाप्त होने के बाद भी ट्रस्टी के पद पर बने रह सकते हैं। इस दावे ने BCI के संस्थागत नियंत्रण और उससे जुड़े निकायों की संरचना को लेकर एक अलग कानूनी प्रश्न खड़ा किया। अदालत के सामने उठाए गए इस मुद्दे से यह संकेत मिलता है कि मामले में केवल चुनाव और पदाधिकारियों के कार्यकाल का प्रश्न ही नहीं, बल्कि BCI से जुड़े संस्थागत ढांचे और उसके नियंत्रण की प्रकृति भी विचार के दायरे में है। हालांकि, इस संबंध में भी अदालत की अंतिम राय अभी सामने नहीं आई है।
सुप्रीम कोर्ट का फिलहाल फोकस चुनाव और पुनर्गठन पर
बुधवार के आदेश से यह स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल BCI में तत्काल नेतृत्व परिवर्तन का आदेश देने के बजाय चुनावी प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से पूरा कराने पर जोर दे रहा है। राज्य बार काउंसिलों को 2 सप्ताह के भीतर जरूरी चुनाव और प्रतिनिधि चयन की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। नई राज्य परिषदों से अनुपालन रिपोर्ट मिलने के बाद अदालत BCI के पुनर्गठन को लेकर आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी। तब तक BCI के महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों को अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल के समक्ष रखने का निर्देश संस्था के कामकाज पर अतिरिक्त निगरानी का प्रावधान करता है। अब इस पूरे मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण राज्य बार काउंसिलों की चुनावी प्रक्रिया और उनकी अनुपालन रिपोर्ट होंगी।