नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली की मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन यानी SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक नई याचिका पर तत्काल सुनवाई करने पर सहमति व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह याचिका 22 सितंबर को अन्य लंबित SIR मामलों के साथ ली जाएगी। नई याचिका को प्राथमिकता दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में तर्क दिया कि लगभग 33.13 लाख मतदाताओं को तार्किक विसंगतियों या मैपिंग की कमी के आधार पर नोटिस जारी किए गए हैं लेकिन उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए। इस पूरे मामले ने मतदाता सूची की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
याचिका में उठाए गए मुख्य सवाल
कार्यकर्ताओं अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण के माध्यम से यह याचिका दायर की है। याचिका में पूछा गया है कि 33.13 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी करने का आधार क्या है और उनके नाम क्यों सार्वजनिक नहीं किए गए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कुछ लोगों को नोटिस मिल रहे हैं जबकि कुछ को नहीं और तार्किक विसंगति की श्रेणी में रखने का आधार भी स्पष्ट नहीं है। प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष मामले का जिक्र करते हुए कहा कि 47 लाख से अधिक नामों को हटाना इस प्रक्रिया का सिर्फ एक हिस्सा है। अब ड्राफ्ट रोल में शामिल लेकिन फ्लैग किए गए 33 लाख मतदाताओं को भी नोटिस भेजे जा रहे हैं।
47.56 लाख नामों के बहिष्करण की पृष्ठभूमि
यह याचिका 31 अगस्त को प्रकाशित दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 47.56 लाख नामों के बहिष्करण की पृष्ठभूमि में आई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह बहिष्करण SIR प्रक्रिया का सिर्फ एक पहलू है। अब अधिकारियों द्वारा ड्राफ्ट रोल में शामिल उन मतदाताओं को नोटिस जारी करने का प्रस्ताव है जिन्हें नो मैपिंग और तार्किक विसंगतियों की श्रेणी में रखा गया है। याचिका में पारदर्शिता की कमी को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। नाम सार्वजनिक न करने से प्रभावित लोगों के लिए अपनी बात रखने और आपत्ति दर्ज कराने में कठिनाई पैदा हो रही है। इस प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रशांत भूषण के तर्क और अदालत का रुख
अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत में तर्क दिया कि अधिकारियों ने उन लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जिन्हें नोटिस भेजे जा रहे हैं। यही वजह है कि कुछ लोगों को नोटिस मिल रहे हैं और कुछ को नहीं। तार्किक विसंगति की श्रेणी में रखने का आधार भी स्पष्ट नहीं किया गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे 22 सितंबर को सुनवाई के लिए रख लिया। अदालत ने नई याचिका को प्राथमिकता देते हुए अन्य लंबित SIR मामलों के साथ जोड़ने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख मतदाता सूची संबंधी मुद्दों पर उसकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
मतदाता सूची की पारदर्शिता और आगे की सुनवाई
दिल्ली की मतदाता सूची में चल रही SIR प्रक्रिया पर यह नई चुनौती पारदर्शिता और प्रभावित मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ी है। याचिका में मांगा गया है कि नोटिस जारी करने का आधार और संबंधित नाम सार्वजनिक किए जाएं ताकि लोग अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकें। 22 सितंबर को होने वाली सुनवाई में अदालत इन मुद्दों पर विस्तार से विचार करेगी। चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए मतदाता सूची का सही और पारदर्शी होना बेहद जरूरी माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई इस पूरे विवाद को नई दिशा दे सकती है। सभी संबंधित पक्ष अदालत के रुख का इंतजार कर रहे हैं।