नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के दो प्रमुख घटकों—समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस—के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान तेज हो गई है। कुल 403 विधानसभा सीटों वाले राज्य में कांग्रेस ने लगभग आधी यानी 200 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की इच्छा जताई है। वहीं, समाजवादी पार्टी कांग्रेस को 50 से ज्यादा सीटें देने के पक्ष में नहीं है। दोनों दलों के शीर्ष नेताओं के बयानों और रणनीतिक चालों से चुनाव पूर्व गठबंधन पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं।
सपा की दो टूक—'जीत की संभावना और संगठनात्मक क्षमता ही तय करेगी सीटें'
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि गठबंधन में सीटों का फॉर्मूला केवल और केवल 'जीत की संभावना' (Winability) के आधार पर तय होगा। अखिलेश यादव के इसी रुख का समर्थन करते हुए प्रतापगढ़ से सपा सांसद डॉ. एस.पी. सिंह पटेल ने कहा कि पार्टी कांग्रेस को 50 से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं है।सपा नेताओं का तर्क है कि किसी भी राजनीतिक दल की सांगठनिक मजबूती और वोट आधार को देखकर ही सीटों का आवंटन किया जाता है। सपा लगातार कांग्रेस को याद दिला रही है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले लड़कर मात्र 2 सीटें जीती थीं, जबकि सपा ने 111 सीटों पर परचम लहराया था। वहीं, 2017 में दोनों दलों के गठबंधन के दौरान कांग्रेस 105 सीटों पर लड़कर केवल 7 सीटें ही जीत सकी थी।
'सम्मानजनक गठबंधन चाहते हैं, वरना 403 सीटों पर तैयारी': यूपी कांग्रेस प्रभारी
सपा के रुख पर पलटवार करते हुए उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि कांग्रेस समानता और सम्मान के आधार पर गठबंधन की उम्मीद करती है।उन्होंने कहा, "हम 200 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं और चाहते हैं कि अक्टूबर तक सीटों का बंटवारा अंतिम रूप ले ले ताकि हमारे प्रत्याशियों को प्रचार का पर्याप्त समय मिल सके। अगर ऐसा नहीं होता है, तो हमारा संगठन सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। क्या किसी दल को खुद को खत्म करके गठबंधन बनाना चाहिए?"
अन्य ओबीसी गुटों से राहुल गांधी की मुलाकात, सपा पर दबाव बनाने की रणनीति?
कांग्रेस का आत्मविश्वास हाल के दिनों में कई गैर-सपा ओबीसी संगठनों के साथ हुई बैठकों के बाद बढ़ा है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पूर्व सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य (राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी), जनवादी पार्टी के संजय चौहान और अपना दल (कैमरावादी) के पंकज निरंजन से मुलाकातें की हैं।राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इन मुलाकातों के जरिए कांग्रेस, सपा को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह यूपी में चुनावी विकल्पों के लिए केवल अखिलेश यादव पर निर्भर नहीं है।
रायबरेली से अखिलेश की रथयात्रा के बाद बढ़ा था विवाद
दोनों दलों के बीच तल्खी की शुरुआत 24 सितंबर को हुई, जब अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली से वंचित वर्गों के समर्थन में एक रथयात्रा की शुरुआत की थी। इसके जवाब में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व ने सपा के गढ़ यानी मैनपुरी, इटावा और सैफई से प्रचार अभियान शुरू करने का ऐलान कर दिया था। हालांकि, कांग्रेस के नए प्रांतीय कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद ने अब अधिक व्यावहारिक रुख अपनाते हुए कहा है कि दोनों दलों को तुरंत पूरी पारदर्शिता के साथ सीटों का निर्णय कर लेना चाहिए ताकि भाजपा के खिलाफ ठोस रणनीति तैयार की जा सके।