कोलकाता/बर्दवान:पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में लोकतंत्र के उत्सव के बीच एक अजीबोगरीब तस्वीर सामने आई है। जहाँ आमतौर पर वोट डालने के बाद 'थर्ड पोलिंग ऑफिसर' वोटर स्लिप को फाड़कर फेंक देता था, वहीं इस बार बंगाल के मतदाता उस 'मामूली' पर्ची को झपटकर अपनी जेब और घरों की तिजोरियों में सुरक्षित रख रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
बर्दवान उत्तर से लेकर बसीरहाट और करीमपुर से लेकर काकद्वीप तक, हजारों बूथों पर मतदाताओं ने मतदान के बाद अपनी वोटर स्लिप वापस मांग ली। इसका मुख्य कारण सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक कथित निर्देश है, जिसमें दावा किया गया है कि यह वोटर स्लिप भविष्य में भारतीय नागरिकता (NRC) साबित करने के लिए एक अनिवार्य दस्तावेज होगी।
अफवाह और हकीकत के बीच फंसे मतदाता
राजाहाट-गोपालपुर और भवानीपुर जैसे क्षेत्रों में तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। जब पोलिंग अधिकारियों ने नियम के मुताबिक स्लिप जमा की, तो मतदाता जवानों से शिकायत करने लगे और अपनी पर्ची वापस लेने के लिए बूथ के अंदर तक घुस गए।
भवानीपुर की एक मतदाता सोना घोड़ुई ने बताया, "मैंने तो स्लिप की फोटोकॉपी भी करा ली है। अगर भविष्य में फिर से 'सर्वे' या एनआरसी होता है, तो यह पर्ची काम आएगी।" वहीं सिंगूर के शिशिर दास मंडल का कहना है कि 2016 की नोटबंदी के बाद से लोगों में डर है, इसलिए वे इस पर्ची को 20 साल बाद के लिए भी संभालकर रख रहे हैं।
चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण
मतदाताओं के बीच बढ़ते इस डर को देखते हुए राज्य चुनाव आयोग (CEO) के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह तर्कहीन है।आयोग के अनुसार, वोटर स्लिप का उपयोग केवल बूथ पर मतदाता की पहचान सुनिश्चित करने के लिए होता है।
मतदान की प्रक्रिया पूरी होते ही इस कागज की कोई कानूनी वैल्यू नहीं रह जाती।
नागरिकता साबित करने के लिए इस स्लिप का कोई प्रावधान चुनाव आयोग या सरकार की नियमावली में नहीं है।
भले ही आयोग इसे अफवाह बता रहा हो, लेकिन जमीन पर स्थिति यह है कि 'बीएलओ' द्वारा घर-घर जाकर दी गई इस पर्ची को बंगाल का आम नागरिक अपनी नागरिकता की ढाल मानकर सहेज रहा है।