नई दिल्ली. हाल ही में कमर्शियल गैस सिलेंडर के दामों में एक साथ 993 रुपये तक की बढ़ोतरी ने होटल और रेस्टोरेंट कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पांच किलो वाले सिलेंडर की कीमतों में भी 261 रुपये की वृद्धि हुई है। हालांकि 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन बढ़ती महंगाई के बीच लोगों को आशंका है कि आने वाले समय में घरेलू गैस भी महंगी हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार तय करता है भारत का ईंधन खर्च
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। LPG की कुल जरूरत का लगभग 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों से आता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं तो उसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। घरेलू उत्पादन सीमित होने और लगातार बढ़ती मांग की वजह से भारत वैश्विक बाजार की कीमतों पर काफी हद तक निर्भर रहता है।
मिडिल ईस्ट तनाव बढ़ाता है तेल की कीमतें
दुनिया में तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट क्षेत्र से आता है। ईरान-इजरायल तनाव, युद्ध या अन्य भू-राजनीतिक घटनाएं तेल सप्लाई को प्रभावित करती हैं। जब समुद्री मार्गों या तेल आपूर्ति पर खतरा बढ़ता है तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से ऊपर चली जाती हैं। इसका असर भारत जैसे आयातक देशों पर तुरंत दिखाई देता है और पेट्रोल-डीजल महंगे होने लगते हैं।
डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपया भी बड़ी वजह
कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में खरीदा जाता है। यदि भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो तेल आयात की लागत और बढ़ जाती है। यानी तेल की वैश्विक कीमतें स्थिर रहने पर भी कमजोर रुपया भारत के लिए पेट्रोल और डीजल को महंगा बना सकता है। यही वजह है कि विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव का असर भी आम लोगों की जेब तक पहुंचता है।
टैक्स और परिवहन लागत भी बढ़ाती है बोझ
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में केवल कच्चे तेल की लागत ही शामिल नहीं होती, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स, परिवहन खर्च और डीलर कमीशन भी जुड़े होते हैं। कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने के बावजूद टैक्स संरचना के कारण उपभोक्ताओं को बड़ी राहत नहीं मिल पाती। यही कारण है कि ईंधन कीमतों का असर सीधे रोजमर्रा के खर्च और महंगाई पर दिखाई देता है।
महंगे ईंधन का असर हर घर और कारोबार पर
ईंधन की कीमतें बढ़ने से केवल वाहन चलाना ही महंगा नहीं होता, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने से खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सब कुछ महंगा हो जाता है। होटल, परिवहन, कृषि और छोटे व्यवसायों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहे तो आने वाले समय में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।