साल 1938 में जापान और चीन के बीच युद्ध ने भयावह रूप ले लिया था। चीन के अनेक शहरों और युद्ध क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सैनिक और नागरिक घायल हो रहे थे, लेकिन प्रशिक्षित चिकित्सकों और चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी थी। ऐसे कठिन समय में चीन की ओर से भारत से चिकित्सा सहायता भेजने का अनुरोध किया गया। चीनी सेनापति झू दे ने भारत के नेताओं से सहायता की अपील की, जिसके बाद भारतीय नेतृत्व ने चीन की तत्काल जरूरत को समझते हुए चिकित्सकों की टीम भेजने का निर्णय लिया। उस दौर में भारत स्वयं औपनिवेशिक शासन के अधीन था और संसाधनों की अपनी सीमाएं थीं, फिर भी चीन की पीड़ा को देखते हुए सहायता जुटाने का प्रयास किया गया। इसी मानवीय पहल ने आगे चलकर एक ऐसे भारतीय चिकित्सक की कहानी को जन्म दिया, जिसे चीन ने दशकों बाद भी सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद रखा।
नेताजी की पहल से बनी चिकित्सकों की टीम
चीन की मदद के लिए चिकित्सकों को भेजने की पहल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे नेताजी ने चीन की सहायता के लिए संसाधन जुटाने में सक्रिय सहयोग किया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, भारतीयों से आर्थिक सहायता एकत्र की गई और चिकित्सकों की एक टीम तैयार की गई, जिसे युद्धग्रस्त चीन भेजा गया। इस दल में पांच भारतीय डॉक्टर शामिल थे, जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा और भविष्य की चिंता से ऊपर मानवता की सेवा को रखा। समुद्री मार्ग से चीन की लंबी यात्रा शुरू हुई तो किसी को शायद अंदाजा नहीं था कि इस दल का एक युवा चिकित्सक आगे चलकर भारत और चीन दोनों के इतिहास में विशेष स्थान बना लेगा। यही युवा डॉक्टर थे महाराष्ट्र के सोलापुर से आए द्वारकानाथ कोटनीस।
16 दिन की समुद्री यात्रा में सीखने लगे चीनी भाषा
डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस उस समय महज 28 वर्ष के थे, लेकिन चिकित्सा सेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता असाधारण थी। चीन की ओर जाते हुए करीब 16 दिनों की समुद्री यात्रा में उन्होंने वहां के लोगों से संवाद करने के लिए चीनी भाषा सीखना शुरू कर दिया। यह छोटी-सी घटना उनके व्यक्तित्व की उस विशेषता को सामने लाती है जिसमें चिकित्सा को केवल दवा और उपचार तक सीमित नहीं माना गया था। वे चाहते थे कि घायल व्यक्ति अपनी पीड़ा उन्हें सीधे बता सके और भाषा उपचार के रास्ते में बाधा न बने। चीन पहुंचने के बाद उन्होंने युद्ध क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों में काम किया, जहां आधुनिक अस्पतालों और पर्याप्त चिकित्सा उपकरणों का अभाव था। धीरे-धीरे स्थानीय लोगों और सैनिकों के बीच उनकी पहचान केवल एक विदेशी डॉक्टर की नहीं रही, बल्कि ऐसे चिकित्सक की बन गई जिसने उनकी भाषा, पीड़ा और परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया।
पिता की मृत्यु की खबर मिली, फिर भी मिशन नहीं छोड़ा
कोटनीस की कहानी का सबसे भावुक पक्ष उस समय सामने आया जब भारत से उन्हें अपने पिता के निधन की खबर मिली। एक युवा बेटे के लिए यह ऐसा क्षण था जिसमें परिवार के पास लौटना स्वाभाविक था, लेकिन उन्होंने चीन में अपने घायल मरीजों को छोड़ने का निर्णय नहीं लिया। ऐतिहासिक विवरणों में उनके इस निर्णय को उनके चिकित्सकीय कर्तव्य और मानवीय प्रतिबद्धता का उदाहरण माना जाता है। उन्होंने निजी दुख को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और युद्धग्रस्त लोगों की सेवा जारी रखी। उनके लिए डॉक्टर होना केवल पेशा नहीं था, बल्कि संकट में पड़े इंसान के साथ खड़े रहने की जिम्मेदारी थी। यही कारण है कि चीन में उनके प्रति सम्मान धीरे-धीरे इतना गहरा होता गया कि उनका नाम दोनों देशों के बीच मानवीय मित्रता के प्रतीक के रूप में स्थापित हो गया।
युद्ध के मैदान में 72 घंटे तक लगातार सेवा
चीन-जापान युद्ध के दौरान कोटनीस ने बेहद कठिन परिस्थितियों में चिकित्सा सेवा दी। युद्ध क्षेत्र के अस्पतालों में घायल सैनिक लगातार पहुंचते रहते थे और संसाधनों की कमी के बीच चिकित्सकों को लंबे समय तक काम करना पड़ता था। कई विवरणों में उल्लेख मिलता है कि कोटनीस ने लगातार कई घंटों तक उपचार और शल्य चिकित्सा करते हुए घायल सैनिकों की जान बचाई। कठिन मौसम, सीमित चिकित्सा सामग्री और युद्ध की अनिश्चितता के बावजूद उन्होंने अपना काम जारी रखा। माना जाता है कि उन्होंने बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों का उपचार किया और अनेक लोगों को मृत्यु के मुंह से बाहर निकाला। उनकी सेवा केवल युद्ध के घायलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे चीन की आम जनता के लिए भी चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने में जुटे रहे।
‘के दिहुआ’ नाम से चीन में मिली नई पहचान
चीन में डॉक्टर कोटनीस को स्थानीय लोगों ने ‘के दिहुआ’ नाम से याद किया। यह नाम उनके चीनी नाम का रूप था और समय के साथ यह नाम वहां उनकी पहचान बन गया। एक भारतीय चिकित्सक का चीनी समाज में इस तरह आत्मसात हो जाना उस दौर के भारत-चीन संबंधों की मानवीय गहराई को दर्शाता है। कोटनीस ने भाषा सीखी, स्थानीय लोगों के बीच रहे और युद्ध की भयावह परिस्थितियों में उनके साथ काम किया। इसलिए उनका सम्मान किसी औपचारिक राजनयिक संबंध से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत सेवा और त्याग से पैदा हुआ था। चीन में उनकी स्मृति को आज भी चिकित्सा सेवा, अंतरराष्ट्रीय मित्रता और मानवतावाद के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
भारत-चीन संबंधों की एक असाधारण मानवीय विरासत
डॉक्टर कोटनीस की कहानी भारत और चीन के बीच संबंधों के उस दौर की याद दिलाती है जब दोनों देशों के बीच राजनीतिक समीकरणों से अलग मानवीय जुड़ाव को विशेष महत्व मिला था। उनकी सेवा ने यह दिखाया कि युद्ध, सीमा और राष्ट्रीयता की दीवारों के बावजूद मानव जीवन की रक्षा सबसे बड़ा साझा मूल्य हो सकता है। चीन में उनकी स्मृति से जुड़े संस्थान और स्मारक इस बात के प्रमाण हैं कि उनके योगदान को वहां लंबे समय तक सम्मान मिला। भारत में भी उनका नाम चिकित्सा सेवा और अंतरराष्ट्रीय मानवतावाद की मिसाल के रूप में लिया जाता है। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी डॉक्टर की असली पहचान केवल उसकी डिग्री या पद से नहीं, बल्कि संकट में मानवता के लिए किए गए त्याग से बनती है।
कम उम्र में खत्म हुई जिंदगी, लेकिन कहानी आज भी जिंदा
डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस का जीवन बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन उनकी सेवा का प्रभाव उनकी मृत्यु के बाद भी दशकों तक कायम रहा। चीन में बिताए वर्षों ने उन्हें वहां के लोगों के दिलों में ऐसी जगह दी, जो किसी औपचारिक सम्मान से कहीं बड़ी थी। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि इतिहास केवल युद्ध जीतने वाले सेनापतियों और सत्ता में बैठे नेताओं से नहीं बनता, बल्कि उन अनाम या कम चर्चित लोगों से भी बनता है जो मानवता के लिए अपनी जिंदगी समर्पित कर देते हैं। कोटनीस ने युद्ध के बीच चिकित्सा सेवा को अपना धर्म बनाया और निजी दुखों के बावजूद अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे। इसी कारण उनकी कहानी आज भी भारत और चीन के बीच साझा मानवीय विरासत की सबसे मार्मिक गाथाओं में गिनी जाती है।