नई दिल्ली. देशभर में खेती, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा माने जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को लेकर मौसम विभाग का नया आकलन चिंता बढ़ाने वाला है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार इस बार पूरे मॉनसून सत्र में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। पहले जहां मौसमी वर्षा का अनुमान दीर्घकालिक औसत का 92 प्रतिशत लगाया गया था, वहीं अब इसे घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया है। यह बदलाव संकेत देता है कि आने वाले महीनों में कई क्षेत्रों को वर्षा की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
जून से ही दिख सकते हैं अल नीनो के प्रभाव
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार अल नीनो की सक्रियता अपेक्षा से पहले दिखाई देने के संकेत मिल रहे हैं। पहले इसके प्रभाव जुलाई के आसपास मजबूत होने का अनुमान था, लेकिन अब जून से ही इसके असर महसूस होने की संभावना जताई जा रही है। सामान्य परिस्थितियों में जून के महीने में देश में औसतन 166.9 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की जाती है, लेकिन इस बार यह मात्रा सामान्य से कम रहने का अनुमान है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत महासागर में बनने वाला अल नीनो पैटर्न वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित करता है और भारत में मॉनसून को कमजोर बना सकता है।
खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
कम वर्षा का सीधा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका रहती है, क्योंकि देश का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। हालांकि केंद्र सरकार ने संभावित चुनौतियों को देखते हुए तैयारियां तेज कर दी हैं। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि खरीफ सीजन के लिए खाद और बीज का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है तथा किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी जाएगी। सरकार की कोशिश है कि यदि वर्षा सामान्य से कम भी रहे तो किसानों को आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
बढ़ती गर्मी दुनिया के लिए भी बन रही चुनौती
वैश्विक स्तर पर भी तापमान में लगातार वृद्धि चिंता का विषय बनी हुई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन और ब्रिटेन के मौसम विभाग की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले पांच वर्ष पृथ्वी के लिए अत्यंत गर्म साबित हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में वैश्विक तापमान के नए रिकॉर्ड बनने की संभावना काफी अधिक है। इसका असर कृषि उत्पादन, जल स्रोतों, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य पर व्यापक रूप से दिखाई दे सकता है।
2030 तक तापमान में खतरनाक बढ़ोतरी के संकेत
वैश्विक आकलनों के अनुसार वर्ष 2030 तक किसी एक वर्ष में वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में 1.9 डिग्री सेल्सियस तक अधिक पहुंच सकता है। रिपोर्ट में यह भी संभावना जताई गई है कि अगले पांच वर्षों का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की महत्वपूर्ण सीमा से ऊपर बना रह सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और अधिक गंभीर बना सकती है, जिससे सूखा, गर्मी की लहरें और चरम मौसम संबंधी घटनाएं बढ़ सकती हैं।
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के लिए तैयार रहना होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में दुनिया इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में से कुछ वर्षों का अनुभव कर सकती है। यदि अल नीनो का प्रभाव अपेक्षा से अधिक मजबूत रहा और वैश्विक तापमान वृद्धि की मौजूदा प्रवृत्ति जारी रही, तो भारत सहित कई देशों में भीषण गर्मी, जल संकट और कृषि संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में मौसम विभाग के पूर्वानुमानों पर सतत निगरानी, जल संरक्षण, कृषि प्रबंधन और आपदा तैयारी को प्राथमिकता देना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।