नई दिल्ली. अमेरिकी विदेश नीति मामलों के टिप्पणीकार माइकल रुबिन ने 31 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अपने लेख में तुर्की और पाकिस्तान की कथित वैचारिक गतिविधियों को लेकर गंभीर आशंकाएं व्यक्त की हैं। यह लेख ‘द संडे गार्जियन’ में प्रकाशित हुआ और बाद में मिडिल ईस्ट फोरम की वेबसाइट पर भी उपलब्ध कराया गया। रुबिन का आरोप है कि इन देशों से जुड़े कुछ राजनीतिक, वैचारिक और मीडिया समूह भारत के धार्मिक-सामाजिक अंतर्विरोधों को अपने हित में इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने प्रचार माध्यमों और सामाजिक मंचों के जरिए असंतोष तथा कट्टरपंथी विचारों को बढ़ावा दिए जाने की आशंका जताई है। हालांकि, लेख में प्रस्तुत निष्कर्ष लेखक का विश्लेषण हैं, किसी स्वतंत्र सरकारी जांच या सार्वजनिक रूप से प्रमाणित खुफिया निष्कर्ष का हिस्सा नहीं।
इमरान खान और असीम मुनीर के बयानों को बनाया आधार
रुबिन ने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के 6 अगस्त 2019 के बयान का हवाला दिया है। खान ने उस समय कहा था कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने भारतीय मुसलमानों के लिए अलग मातृभूमि की अवधारणा के समर्थन में दो-राष्ट्र सिद्धांत अपनाया था। रुबिन ने इसी बयान के साथ खान की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने भविष्य में भारत के हिंदू राष्ट्र बन जाने की आशंका जताई थी। लेख में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के 16 अप्रैल 2025 के वक्तव्य को भी शामिल किया गया है। मुनीर ने हिंदुओं और मुसलमानों को जीवन के विभिन्न पहलुओं में अलग-अलग राष्ट्र बताते हुए दो-राष्ट्र सिद्धांत का उल्लेख किया था। रुबिन इन बयानों को पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य विचारधारा में इस सिद्धांत की निरंतरता के संकेत के रूप में देखते हैं।
एर्दोगन की टिप्पणियों को लेकर भारत की आपत्ति
लेख में तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन की भारत संबंधी टिप्पणियों को भी प्रमुखता दी गई है। रुबिन ने 25 सितंबर 2019 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर तुर्की और पाकिस्तान की सह-मेजबानी में आयोजित एक कार्यक्रम का उल्लेख किया है, जहां एर्दोगन ने भारत में गोमांस खाने के मुद्दे पर मुस्लिम युवाओं के साथ कथित हिंसा का सवाल उठाया था। इसके अलावा, उन्होंने सितंबर 2025 में अपनी पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए एर्दोगन की उस टिप्पणी का हवाला दिया, जिसमें भारत में मुसलमानों के नरसंहार का आरोप लगाया गया था। रुबिन का कहना है कि ऐसी बयानबाजी भारत की आंतरिक परिस्थितियों को एकतरफा ढंग से पेश करती है। भारत ने 29 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एर्दोगन की जम्मू-कश्मीर संबंधी टिप्पणी पर आपत्ति जताई थी। विदेश मंत्रालय ने इसे अनुचित बताते हुए कहा था कि भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के मामलों में किसी बाहरी पक्ष की भूमिका नहीं है।
तुर्की के समाचार माध्यमों की टिप्पणियों पर भी सवाल
रुबिन ने अपनी आशंकाओं के समर्थन में तुर्की के कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित लेखों और टिप्पणियों का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, समाचार पत्र ‘यनी शफाक’ के संपादक इब्राहिम करागुल ने 29 अप्रैल 2025 के लेख में कथित तौर पर लिखा था कि यदि चीन और तुर्की पाकिस्तान के साथ खड़े होते हैं तो भारत के टुकड़े हो सकते हैं। इसी समाचार पत्र में 8 मई 2025 को पाकिस्तानी लेखक फरकान हामिद का लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें भारत को अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षित बताया गया था। रुबिन ने तुर्की के समाचार पत्र ‘सबाह’ में स्तंभकार हिलाल कपलान की टिप्पणी का भी हवाला दिया है, जिसमें भारत में मुसलमानों के कथित नरसंहार की बात कही गई थी। हालांकि, किसी समाचार पत्र में प्रकाशित विवादास्पद लेख या संपादकीय टिप्पणी को अपने आप में तुर्की सरकार द्वारा संचालित संगठित प्रचार अभियान का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
सामाजिक माध्यमों के जरिए कट्टरपंथी प्रचार की आशंका
रुबिन का आरोप है कि पाकिस्तान और तुर्की से जुड़े कुछ वैचारिक समूह समाचार माध्यमों, सामाजिक मंचों, संगठनों और सहायता संस्थाओं के जरिए भारत में धार्मिक असंतोष को बढ़ावा देने का प्रयास कर सकते हैं। उन्होंने आशंका जताई है कि इस तरह की गतिविधियां भारत के विभिन्न राज्यों में सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को गहरा कर सकती हैं। लेख में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि बाहरी प्रचार के माध्यम से कट्टरपंथी विचारों को समर्थन मिलता है तो उसका असर देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और आर्थिक वातावरण पर पड़ सकता है। हालांकि, रुबिन ने अपने लेख में किसी विशिष्ट विदेशी संगठन, वित्तीय नेटवर्क या भारत में संचालित प्रमाणित अभियान का विस्तृत साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है। इसलिए इन दावों की पुष्टि के लिए डिजिटल गतिविधियों, धन के प्रवाह और संबंधित संगठनों की स्वतंत्र तथा प्रमाण आधारित जांच आवश्यक होगी।
संप्रभुता की रक्षा के साथ सामाजिक सद्भाव भी जरूरी
रुबिन के लेख ने विदेशी प्रचार, धार्मिक ध्रुवीकरण और क्षेत्रीय कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है, जबकि तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस विषय पर कई बार टिप्पणी कर चुके हैं। सितंबर 2026 में भारत ने एर्दोगन के वक्तव्य पर आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा विषय है। लेकिन विदेशी नेताओं के बयान, मीडिया में प्रकाशित विचार और किसी देश की ओर से संचालित वास्तविक हस्तक्षेप—इन तीनों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। भारत के लिए जरूरी है कि वह किसी भी प्रमाणित बाहरी दुष्प्रचार का तथ्यपरक और प्रभावी जवाब दे, साथ ही अपने बहुलतावादी समाज, संवैधानिक अधिकारों और सांप्रदायिक सद्भाव को मजबूत बनाए रखे। किसी पूरे समुदाय को संदेह के दायरे में रखने के बजाय संदिग्ध गतिविधियों और उनके जिम्मेदार तत्वों की निष्पक्ष जांच ही अधिक उचित रास्ता है।