मुम्बई. नूतन का जन्म 4 जून 1936 को एक प्रतिष्ठित फिल्मी परिवार में हुआ था। उनकी मां शोभना समर्थ अपने समय की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं, जबकि पिता कुमारसेन समर्थ एक जाने-माने निर्देशक और कवि थे। घर का वातावरण पूरी तरह कला और सिनेमा से जुड़ा हुआ था, लेकिन इसके बावजूद नूतन को अपनी पहचान बनाने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ा। बचपन से ही उनमें अभिनय के प्रति गहरी रुचि थी और उनकी गंभीर, शांत तथा आत्मविश्वासी व्यक्तित्व ने उन्हें बाकी अभिनेत्रियों से अलग बनाया।
शुरुआती संघर्ष और असफलताओं से भरा दौर
नूतन ने बहुत कम उम्र में फिल्मों में कदम रखा, लेकिन शुरुआत उनके लिए आसान नहीं रही। शुरुआती फिल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कई बार आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। उस दौर में ग्लैमर और पारंपरिक सुंदरता को सफलता का आधार माना जाता था, जबकि नूतन का व्यक्तित्व बेहद सादा और स्वाभाविक था। कई निर्माताओं को लगता था कि उनका चेहरा पारंपरिक फिल्मी नायिकाओं जैसा नहीं है, लेकिन नूतन ने हार नहीं मानी और अपने अभिनय कौशल को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। धीरे-धीरे उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा अभिनय किसी भी बनावटी आकर्षण से कहीं अधिक प्रभावशाली होता है।
‘सीमा’ और ‘बंदिनी’ जैसी फिल्मों ने दिलाई अमर पहचान
नूतन की अभिनय प्रतिभा का वास्तविक विस्फोट फिल्म “सीमा” से हुआ, जिसमें उन्होंने एक विद्रोही और संवेदनशील युवती का किरदार निभाया। इस फिल्म ने उन्हें अभिनय जगत में नई पहचान दिलाई और दर्शकों को यह एहसास कराया कि हिंदी सिनेमा में एक असाधारण अभिनेत्री का उदय हो चुका है। इसके बाद “बंदिनी”, “सुजाता”, “सरस्वतीचंद्र”, “मिलन”, “मैं तुलसी तेरे आंगन की” और “अनाड़ी” जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसे चरित्र निभाए, जो आज भी अभिनय की पाठशाला माने जाते हैं। विशेष रूप से “बंदिनी” में उनके भावनात्मक अभिनय को भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे प्रभावशाली प्रदर्शनों में गिना जाता है।
चरित्र भूमिकाओं में भी छोड़ी अमिट छाप
नूतन केवल मुख्य नायिका तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने चरित्र भूमिकाओं में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने मां, त्यागमयी स्त्री और भावनात्मक रूप से मजबूत महिलाओं के किरदार निभाए, जिन्हें दर्शकों ने बेहद पसंद किया। “मेरी जंग” में मां की भूमिका हो या पारिवारिक फिल्मों में उनकी गरिमामयी उपस्थिति, हर किरदार में उन्होंने भावनाओं की गहराई और वास्तविकता का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत किया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अभिनय नहीं करती थीं, बल्कि किरदार को जीती थीं।
पुरस्कारों और उपलब्धियों से भरा गौरवशाली सफर
नूतन हिंदी सिनेमा की उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में शामिल रहीं, जिन्होंने अपने समय में सर्वाधिक फिल्मफेयर पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया। उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए कई बार सम्मानित किया गया और उनके अभिनय को आलोचकों तथा दर्शकों दोनों ने समान रूप से सराहा। उनकी फिल्मों ने सिर्फ व्यावसायिक सफलता ही नहीं पाई, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर भी दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। नूतन को भारतीय सिनेमा में महिला पात्रों को गंभीरता और गरिमा प्रदान करने वाली अभिनेत्रियों में अग्रणी माना जाता है।
सादगी, संस्कार और अभिनय का अद्भुत संगम थीं नूतन
नूतन की निजी जिंदगी भी उनकी फिल्मों की तरह सरल और प्रेरणादायक रही। वे बेहद अनुशासित, संवेदनशील और आध्यात्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। ग्लैमर की चकाचौंध के बीच भी उन्होंने अपनी सादगी को कभी नहीं छोड़ा। यही कारण था कि दर्शक उन्हें सिर्फ एक स्टार नहीं, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानते थे। उनकी मुस्कान, संवाद अदायगी और आंखों से भाव व्यक्त करने की कला आज भी नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
भारतीय सिनेमा में हमेशा अमर रहेगा नूतन का नाम
21 फरवरी 1991 को नूतन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनका अभिनय आज भी भारतीय सिनेमा की धरोहर माना जाता है। उन्होंने यह साबित किया कि अभिनय की असली शक्ति भावनाओं की सच्चाई में होती है, न कि केवल बाहरी आकर्षण में। नूतन ने हिंदी फिल्मों में महिला पात्रों को नई गरिमा, गहराई और सम्मान दिया। यही वजह है कि दशकों बाद भी उनका नाम भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में अत्यंत सम्मान और प्रेम के साथ लिया जाता है।