प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की अफसरशाही के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा है कि अदालत के आदेशों की जानबूझकर अनदेखी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस सुधार और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े निर्देशों को कमजोर करने की कोशिश किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं की जा सकती।
वरिष्ठ IAS अधिकारी के रवैये पर हाईकोर्ट की नाराजगी
जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि न्यायालय द्वारा प्रशासनिक सुधारों के लिए दिए गए निर्देशों का पालन कराने के बजाय उन्हें कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, जो कानून के शासन की भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि आदेशों की अवहेलना प्रशासनिक जिम्मेदारी से बचने का तरीका नहीं बन सकती।
कौटिल्य का उदाहरण देकर जवाबदेही पर जोर
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कौटिल्य के विचारों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह प्राचीन काल में प्रशासकों के कार्यों की नियमित निगरानी आवश्यक मानी जाती थी, उसी प्रकार आधुनिक प्रशासन में भी अधिकारियों की कार्यशैली, निर्णय और परिणामों की निरंतर समीक्षा जरूरी है। जवाबदेही ही सुशासन की सबसे बड़ी कसौटी है।
नाबालिग लड़की की गुमशुदगी से जुड़ा है मामला
यह मामला एक महिला द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से संबंधित है। महिला ने आरोप लगाया था कि उसकी नाबालिग बेटी कई दिनों से लापता है, लेकिन पुलिस उसे खोजने में नाकाम रही। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जांच न तो निष्पक्ष थी और न ही प्रभावी ढंग से की गई। पुलिस ने चार्जशीट दाखिल करते समय कई महत्वपूर्ण तथ्यों और संभावित आरोपियों की अनदेखी की।
पुलिस जांच पर भी उठाए गंभीर सवाल
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की जांच में गंभीर लापरवाही दिखाई गई है। अदालत के अनुसार, जांच एजेंसियों ने तथ्यों की गहराई से पड़ताल नहीं की और कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया। इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई और पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने में बाधा उत्पन्न हुई।
राज्य सरकार की दलील पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि सरकार अदालत के कुछ निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। हालांकि कोर्ट ने पाया कि इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। अदालत ने इसे समय टालने की रणनीति बताते हुए नाराजगी जाहिर की और कहा कि केवल दलीलों से जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता।
DoPT और ACC को भेजा गया मामला
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने इसे भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा है कि इसे कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) के समक्ष भी रखा जाए ताकि संबंधित अधिकारी की भविष्य की नियुक्तियों और प्रशासनिक उपयुक्तता पर विचार किया जा सके।