कोलकाता डेस्क: भारत में खाद्य कीमतों को लेकर आने वाले महीनों में मौसम एक अहम चुनौती बन सकता है। चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों की कीमतों में हालिया बदलाव के बीच El Nino को लेकर निगरानी बढ़ गई है। हालांकि, अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि मौजूदा कीमतों में बढ़ोतरी सीधे El Nino की वजह से हुई है। चिंता इस बात की है कि अगर मौसम का असर फसलों और आपूर्ति पर पड़ा, तो खाद्य महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
चावल की कीमतों में बढ़ोतरी
सरकारी मूल्य निगरानी के आंकड़ों के मुताबिक, 29 सितंबर 2026 को थोक चावल की कीमत करीब 4,185 रुपये प्रति क्विंटल रही। यह पिछले साल की समान अवधि की तुलना में लगभग 8.5 फीसदी अधिक है। खुदरा बाजार में भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अरहर दाल भी हुई महंगी
दालों की कीमतों में भी अलग-अलग रुझान देखने को मिल रहे हैं। सितंबर के आखिरी सप्ताह में अरहर यानी तूर दाल 125 रुपये प्रति किलो से अधिक के स्तर पर थी और इसकी कीमत सालाना आधार पर करीब 8 फीसदी ज्यादा बताई गई। उड़द की कीमत भी बढ़ी है, जबकि मूंग, मसूर और चने में सालाना बढ़ोतरी अपेक्षाकृत सीमित रही।
हालांकि, इन कीमतों को अभी El Nino का सीधा असर मानना सही नहीं होगा। असली जोखिम आगे का है। यदि बारिश का पैटर्न प्रभावित होता है और फसलों की पैदावार घटती है, तो घरेलू आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
खाद्य तेलों पर सरकार ने दी राहत
खाद्य तेलों के मामले में सरकार ने आयात शुल्क में कटौती का कदम उठाया है। 24 सितंबर से कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई। वहीं कच्चे सूरजमुखी तेल पर यह शुल्क शून्य कर दिया गया।
रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 32.5 फीसदी से घटाकर 27.5 फीसदी, जबकि रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर शुल्क 22.5 फीसदी किया गया है। सरकार के मुताबिक, इससे आयात की लागत कम करने और घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों पर दबाव घटाने में मदद मिल सकती है।
El Nino से क्यों बढ़ी चिंता?
अगस्त 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में केंद्र सरकार ने El Nino को निगरानी योग्य जोखिम के तौर पर चिन्हित किया था। लगातार मजबूत El Nino की स्थिति से मानसून कमजोर या असमान हो सकता है, जिसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है।
हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि El Nino और कृषि उत्पादन के बीच सीधा और एक जैसा संबंध मानना उचित नहीं है। सिंचाई व्यवस्था, सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे उपाय इसके प्रभाव को कम कर सकते हैं।
WMO की चेतावनी से बढ़ी निगरानी
विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO की 23 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के अंत तक El Nino के बहुत मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान है। इसका प्रभाव केवल प्रशांत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।
भारत के लिए इसका महत्व इस बात से तय होगा कि El Nino का असर मानसून, फसल चक्र और मौजूदा खाद्य आपूर्ति व्यवस्था के साथ किस तरह जुड़ता है।
सरकार के पास क्या हैं विकल्प?
भारत के पास खाद्य आपूर्ति को संभालने के लिए कई उपाय मौजूद हैं। सरकारी खरीद और बफर स्टॉक से जरूरत के समय बाजार में उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। किसी वस्तु की घरेलू आपूर्ति कम होने पर आयात के जरिए भी कमी पूरी की जा सकती है।
खाद्य तेलों पर हालिया आयात शुल्क कटौती इसी तरह के नीति उपायों का उदाहरण है। ऐसे कदम वैश्विक कीमतों के असर को घरेलू बाजार तक पहुंचने से कुछ हद तक रोक सकते हैं।
RBI के लिए भी अहम होगा खाद्य महंगाई का रुख
खाद्य कीमतों में लगातार बढ़ोतरी केवल घरेलू बजट के लिए ही नहीं, बल्कि देश की व्यापक महंगाई के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि मौसम से जुड़ी महंगाई लंबे समय तक बनी रहती है और इसका असर अन्य वस्तुओं की कीमतों तक पहुंचता है, तो यह भारतीय रिजर्व बैंक के महंगाई आकलन के लिए भी महत्वपूर्ण कारक बन सकता है।
फिलहाल तस्वीर एक जैसी नहीं है। चावल और कुछ दालों की कीमतों में बढ़ोतरी दिख रही है, खाद्य तेल वैश्विक बाजार की परिस्थितियों से प्रभावित हो सकते हैं और सरकार ने आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाए हैं। इसलिए आने वाले महीनों में El Nino का असर केवल मौसम तक सीमित रहता है या खाद्य कीमतों पर भी दिखाई देता है, यह मानसून, फसल उत्पादन और सरकारी आपूर्ति प्रबंधन पर निर्भर करेगा।