चंडीगढ़: पंजाब के बासमती चावल निर्यातकों के लिए ऑस्ट्रेलिया से बड़ी चिंता सामने आई है। ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों द्वारा कुछ भारतीय फ्यूमिगेशन सेवा प्रदाताओं के प्रमाणपत्रों को स्वीकार करना बंद किए जाने के बाद करीब 50 से 60 कंटेनर बासमती चावल के वापस भेजे जाने का खतरा मंडरा रहा है। इन कंटेनरों में पंजाब और हरियाणा के निर्यातकों का चावल शामिल है। निर्यातकों का कहना है कि उन्होंने भारत में लागू नियमों के तहत ही अधिकृत सेवा प्रदाताओं से फ्यूमिगेशन कराया था। इसके बावजूद अब उन्हें आर्थिक नुकसान उठाने की स्थिति में ला दिया गया है।
ऑस्ट्रेलिया में भारतीय बासमती के कंटेनर संकट में
ऑस्ट्रेलिया पहुंच चुके भारतीय बासमती चावल के कई कंटेनर अब मुश्किल में फंस गए हैं। निर्यातकों के मुताबिक करीब 50 से 60 कंटेनरों पर वापस भारत भेजे जाने का खतरा है। पंजाब और हरियाणा इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले राज्यों में शामिल हैं। अमृतसर के एक प्रमुख निर्यातक के अनुसार अकेले शहर से जुड़े 40 से 50 कंटेनर प्रभावित हो सकते हैं। इन खेपों में ऐसा चावल भी शामिल है, जो खुदरा पैकिंग में ऑस्ट्रेलिया भेजा गया था। निर्यातकों को डर है कि यदि माल वापस लौटता है तो परिवहन और अन्य खर्च कई गुना बढ़ जाएंगे। इसके अलावा ऑस्ट्रेलियाई खरीदारों की ओर से आदेश रद्द होने का भी खतरा बना हुआ है। इस पूरे मामले में निर्यातकों और भारतीय अधिकारियों के सामने आर्थिक नुकसान की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
फ्यूमिगेशन प्रमाणपत्र बना विवाद की मुख्य वजह
बासमती चावल को विदेश भेजने से पहले फ्यूमिगेशन की प्रक्रिया की जाती है, ताकि उसमें मौजूद संभावित कीट और संक्रमण खत्म किए जा सकें। ऑस्ट्रेलिया में जैव सुरक्षा नियम बेहद सख्त हैं और वहां प्रवेश करने वाली खाद्य खेपों की कड़ी जांच होती है। खास तौर पर ‘खापरा बीटल’ जैसे खतरनाक कीटों को देश में प्रवेश करने से रोकने के लिए उपचार और प्रमाणपत्र जरूरी होते हैं। निर्यातकों का कहना है कि उन्होंने भारत की व्यवस्था के तहत स्वीकृत सेवा प्रदाताओं से ही फ्यूमिगेशन कराया था। फ्यूमिगेशन के बाद उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रमाणपत्र भी जारी किए गए। लेकिन बाद में ऑस्ट्रेलिया ने कुछ सेवा प्रदाताओं की मंजूरी निलंबित कर दी। इसके बाद उन्हीं प्रदाताओं द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्रों पर सवाल उठने लगे। निर्यातक पूछ रहे हैं कि जब प्रक्रिया के समय सेवा प्रदाता अधिकृत थे, तो बाद की कार्रवाई का आर्थिक बोझ उन पर क्यों डाला जा रहा है?
ऑस्ट्रेलिया ने क्यों शुरू की सख्त जांच?
ऑस्ट्रेलिया के कृषि, मत्स्य और वानिकी विभाग ने भारत में फ्यूमिगेशन सेवा प्रदाताओं की जांच तेज की। जून में ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों की एक टीम ने भारत में जैव सुरक्षा संबंधी जांच की। इस जांच में पंजाब और हरियाणा में काम करने वाले कई सेवा प्रदाताओं की सुविधाओं और रिकॉर्ड को देखा गया। बताया गया कि करीब सात सेवा प्रदाताओं की जांच की गई, जिनमें ज्यादातर इन्हीं दो राज्यों से जुड़े थे।अधिकारियों ने केवल प्रमाणपत्रों की जांच नहीं की, बल्कि फ्यूमिगेशन की पूरी प्रक्रिया और उससे जुड़े दस्तावेज भी देखे। जांच के दौरान कुछ सेवा प्रदाताओं के रिकॉर्ड और प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने कई भारतीय फ्यूमिगेशन सेवा प्रदाताओं की मंजूरी निलंबित कर दी। इस कार्रवाई के बाद पहले से जारी प्रमाणपत्रों वाली खेपों की स्वीकार्यता भी सवालों के घेरे में आ गई।
रिकॉर्ड में कमी से बढ़ा विवाद
निर्यातकों के मुताबिक ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने एक सेवा प्रदाता के रिकॉर्ड में जरूरी जानकारी के रखरखाव को लेकर आपत्ति जताई। बताया गया कि सेवा प्रदाता निर्यातक की फैक्ट्री में पहुंचा और वहां फ्यूमिगेशन की प्रक्रिया पूरी की। इसके बाद निर्यातक को निर्धारित प्रमाणपत्र उपलब्ध कराया गया। हालांकि आरोप है कि सेवा प्रदाता ने फ्यूमिगेशन से जुड़े जरूरी रिकॉर्ड सही तरीके से सुरक्षित नहीं रखे। ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने इसी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए। निर्यातकों का कहना है कि रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारी सेवा प्रदाता की थी, न कि चावल निर्यात करने वाले कारोबारी की। उनका तर्क है कि उन्होंने भारत में मौजूद सरकारी व्यवस्था के अनुसार अधिकृत एजेंसी की सेवाएं ली थीं। ऐसे में सेवा प्रदाता की गलती का खामियाजा निर्यातकों को भुगतना अनुचित है।
भारत की सरकारी व्यवस्था पर भी उठे सवाल
फ्यूमिगेशन की प्रक्रिया भारत की पौध संगरोध व्यवस्था के तहत अधिकृत उपचार सेवा प्रदाताओं द्वारा की जाती है। इसके बाद राष्ट्रीय पादप संरक्षण संगठन की व्यवस्था के तहत अधिकृत अधिकारी पादप स्वच्छता प्रमाणन से जुड़े कार्य संभालते हैं। निर्यातकों का कहना है कि पूरी प्रक्रिया भारतीय नियमों के अनुसार पूरी की गई थी। उन्होंने दावा किया कि संबंधित अधिकारियों की निगरानी में फ्यूमिगेशन और प्रमाणन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। अब ऑस्ट्रेलिया की आपत्तियों के बाद यह सवाल उठ रहा है कि भारतीय व्यवस्था में निगरानी और रिकॉर्ड प्रबंधन कितना प्रभावी था। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ने संबंधित सेवा प्रदाताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की है। अधिकारियों के मुताबिक दोषी पाए जाने वाले सेवा प्रदाताओं को प्रतिबंधित किए जाने की कार्रवाई भी की जा सकती है। हालांकि इससे पहले से भेजी जा चुकी खेपों के नुकसान की भरपाई कैसे होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
250 से ज्यादा कंटेनर रास्ते में, कई पर संकट
निर्यातकों के अनुसार 250 से अधिक बासमती चावल के कंटेनर उस समय ऑस्ट्रेलिया की ओर रास्ते में थे। इनमें से करीब 40 से 45 कंटेनरों में ऐसे सेवा प्रदाता द्वारा फ्यूमिगेशन किया गया था, जिसकी मंजूरी बाद में निलंबित कर दी गई। अब ऑस्ट्रेलिया में ऐसे प्रमाणपत्रों वाली खेपों को लेकर आपत्ति जताई जा रही है। निर्यातकों का कहना है कि इससे भारतीय कारोबारियों के सामने अचानक बड़ी वित्तीय समस्या खड़ी हो गई है। कई कंटेनर पहले ही ऑस्ट्रेलियाई बंदरगाहों पर पहुंच चुके हैं। वहीं कुछ खेपों के भविष्य को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। निर्यातकों को आशंका है कि यदि जांच और कार्रवाई का दायरा बढ़ा तो और कंटेनर प्रभावित हो सकते हैं। इससे पंजाब और हरियाणा के बासमती कारोबार पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की संभावना है।
सरकार से मुआवजे की मांग
निर्यातकों ने इस पूरे मामले में सरकार से आर्थिक मदद और मुआवजे की मांग की है। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी तरफ से नियमों का उल्लंघन नहीं किया था। फ्यूमिगेशन के लिए उन्होंने भारत में अधिकृत सेवा प्रदाताओं को चुना था और उन्हीं से प्रमाणपत्र प्राप्त किए थे। यदि बाद में किसी सेवा प्रदाता की मंजूरी रद्द या निलंबित होती है तो उसका पूरा नुकसान निर्यातक पर नहीं डाला जाना चाहिए। एक अमृतसर निर्यातक ने सरकार से नुकसान की भरपाई करने की मांग की है। निर्यातकों का कहना है कि उन्हें माल की वापसी, दोबारा फ्यूमिगेशन और परिवहन जैसे कई अतिरिक्त खर्च उठाने पड़ सकते हैं। इसके साथ ही खरीदारों के आदेश रद्द होने से व्यापारिक नुकसान अलग हो सकता है। ऐसे में सरकार के हस्तक्षेप के बिना कई छोटे और मध्यम निर्यातकों पर बड़ा आर्थिक दबाव पड़ सकता है।
खुदरा पैकिंग वाले चावल की दोबारा फ्यूमिगेशन में मुश्किल
इस मामले में सबसे बड़ी समस्या खुदरा पैकिंग वाले चावल को लेकर सामने आ रही है। कई खेपों में चावल 1, 5, 15 और 20 किलोग्राम के पैकेट में पैक किया गया है। ऐसे पैकेटों की दोबारा फ्यूमिगेशन करना आसान नहीं है। उपचार के लिए पैकेटों में कई जगह छेद करने पड़ सकते हैं, जिससे उनकी पैकिंग खराब हो सकती है। पैकेट खराब होने के बाद उत्पाद को बाजार में बेचना मुश्किल हो सकता है। इसके विपरीत थोक में भेजे गए चावल को कंटेनर के भीतर दोबारा उपचारित करना अपेक्षाकृत आसान है। इसी वजह से कुछ थोक खेपों को ऑस्ट्रेलिया में उपचार के बाद स्वीकार किए जाने की संभावना बनी हुई है। वहीं खुदरा पैक वाली कई खेपों के भारत लौटने का खतरा बढ़ गया है।
बंदरगाह पर रोजाना बढ़ रहा अतिरिक्त खर्च
ऑस्ट्रेलियाई बंदरगाहों पर रुके कंटेनरों से निर्यातकों की परेशानी और बढ़ रही है। निर्यातकों के मुताबिक एक कंटेनर पर करीब 500 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर प्रतिदिन तक का अतिरिक्त बंदरगाह शुल्क लग सकता है। इसे डेमरेज शुल्क कहा जाता है, जो तय मुफ्त अवधि से अधिक समय तक माल बंदरगाह पर रखने पर देना पड़ता है। जितनी देर कंटेनर बंदरगाह पर रुकेगा, उतना ही आर्थिक बोझ निर्यातकों पर बढ़ता जाएगा। यदि खेप भारत वापस भेजी जाती है तो समुद्री परिवहन का खर्च भी निर्यातक को उठाना पड़ सकता है। इसके बाद दोबारा फ्यूमिगेशन और नए निर्यात की प्रक्रिया पर भी अतिरिक्त रकम खर्च होगी। खरीदार द्वारा आदेश रद्द किए जाने की स्थिति में व्यापारिक नुकसान और बढ़ सकता है। इस तरह एक ही खेप पर कई स्तरों पर आर्थिक नुकसान होने की आशंका है।
गुणवत्ता नहीं, जैव सुरक्षा नियमों से जुड़ा है विवाद
भारतीय अधिकारियों के अनुसार ऑस्ट्रेलिया की कार्रवाई भारतीय बासमती चावल की गुणवत्ता को लेकर नहीं है। मुख्य विवाद फ्यूमिगेशन और जैव सुरक्षा प्रमाणन की प्रक्रिया को लेकर है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया की कड़ी जैव सुरक्षा व्यवस्थाओं वाले देशों में माना जाता है। वहां अब केवल दस्तावेज देखकर ही उपचार प्रक्रिया को स्वीकार करने के बजाय लगातार अनुपालन और जांच पर अधिक जोर दिया जा रहा है। विदेशी सेवा प्रदाताओं की कार्यप्रणाली की जांच भी इसी व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है। इसका सीधा असर भारत से ऑस्ट्रेलिया जाने वाली कृषि और खाद्य उत्पादों की खेपों पर पड़ सकता है। निर्यातकों के लिए अब केवल उत्पाद की गुणवत्ता सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें फ्यूमिगेशन, प्रमाणन, दस्तावेज और पैकिंग समेत पूरी निर्यात प्रक्रिया में नियमों का पालन सुनिश्चित करना होगा।
पहले से बढ़ी हुई है निर्यातकों की लागत
ऑस्ट्रेलिया में सामने आया यह विवाद ऐसे समय आया है जब पंजाब के बासमती निर्यातक पहले से ही बढ़ती माल ढुलाई लागत का सामना कर रहे हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास जारी व्यवधानों का असर भी समुद्री परिवहन पर पड़ा है। इसके कारण निर्यातकों की लागत बढ़ी है और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बना हुआ है। अब ऑस्ट्रेलिया में कंटेनरों के अटकने से कारोबारियों की परेशानी और बढ़ गई है। निर्यातकों को आशंका है कि लंबे समय तक माल रुका तो लागत लगातार बढ़ती जाएगी। वहीं वापस लौटने वाली खेपों के कारण नए ऑर्डर और बाजार में भारतीय चावल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। पंजाब के बासमती उद्योग के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया एक प्रमुख विदेशी बाजार है। निर्यातक अब सरकार से जल्द समाधान निकालने और ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के साथ बातचीत करने की मांग कर रहे हैं।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऑस्ट्रेलिया में रुकी सभी खेपों का भविष्य क्या होगा। कुछ थोक खेपों को दोबारा उपचार के बाद स्वीकार किए जाने की संभावना जताई गई है। लेकिन खुदरा पैकिंग वाले चावल के लिए स्थिति अधिक जटिल बनी हुई है। भारत सरकार और संबंधित एजेंसियों के सामने निर्यातकों के हितों की रक्षा करने की चुनौती है। सेवा प्रदाताओं की जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। निर्यातकों का कहना है कि नियमों के अनुसार काम करने वाले कारोबारियों को किसी अन्य पक्ष की गलती का नुकसान नहीं उठाना चाहिए। अब सभी की नजर सरकार और ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के बीच होने वाली आगे की कार्रवाई पर है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो करोड़ों रुपये के नुकसान के साथ भारतीय बासमती निर्यातकों के सामने नए व्यापारिक संकट खड़े हो सकते हैं।