नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। शोध संस्था बीएमआई की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस संकट के चलते भारत का राजकोषीय घाटा निर्धारित लक्ष्य से ऊपर जा सकता है। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि यह घाटा जीडीपी के 4.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जो बजटीय लक्ष्य से अधिक है।
सरकार का लक्ष्य और संभावित विचलन
केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में राजकोषीय घाटे को 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया था। यह पिछले वित्त वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान 4.4 प्रतिशत से थोड़ा कम है। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इस लक्ष्य को हासिल करना चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है।
नीतिगत हस्तक्षेप की संभावना
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न आर्थिक दबाव को कम करने के लिए कई कदम उठा सकती है। इसमें प्रमुख उद्योगों को संसाधनों का पुनः आवंटन, व्यावसायिक लागतों को नियंत्रित करना और कंपनियों को अतिरिक्त वित्तीय सहायता देना शामिल हो सकता है। इससे उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला को स्थिर बनाए रखने में मदद मिलेगी।
कच्चे माल पर निर्यात नियंत्रण का संकेत
बीएमआई का यह भी अनुमान है कि सरकार सेमीकंडक्टर निर्माण में उपयोग होने वाले हीलियम और सल्फर जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा सकती है। सल्फर उर्वरक उत्पादन के लिए भी जरूरी है, इसलिए यह कदम कृषि क्षेत्र को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से उठाया जा सकता है।
होरमुज जलडमरूमध्य का बड़ा महत्व
होरमुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस गुजरती है। इस मार्ग में किसी भी तरह की रुकावट से भारत सहित कई देशों की ऊर्जा लागत बढ़ सकती है, जिससे आर्थिक दबाव और गहरा सकता है।
आर्थिक स्थिरीकरण कोष की स्थापना
केंद्र सरकार ने बढ़ती लागत और आपूर्ति बाधाओं से निपटने के लिए एक लाख करोड़ रुपये का आर्थिक स्थिरीकरण कोष स्थापित किया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह कोष वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय व्यय में जीडीपी का लगभग 0.1 प्रतिशत अतिरिक्त योगदान करेगा।
कृषि और रोजगार पर संभावित असर
भारत की लगभग 43 प्रतिशत कार्यबल कृषि क्षेत्र में कार्यरत है। ऐसे में उर्वरक उत्पादन या आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर किसानों और खाद्य उत्पादन पर पड़ सकता है। सरकार इस जोखिम को कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की तैयारी में है।
आर्थिक संतुलन की चुनौती
पश्चिम एशिया संकट ने भारत के लिए आर्थिक संतुलन बनाए रखना कठिन बना दिया है। एक ओर विकास और निवेश को गति देना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते व्यय और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच वित्तीय अनुशासन बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बन गया है।