वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी माह में भारत का व्यापार घाटा घटकर 27.1 अरब डॉलर रह गया, जो जनवरी में संशोधित 34.68 अरब डॉलर था। यह आंकड़ा अर्थशास्त्रियों के अनुमान से भी बेहतर रहा, क्योंकि अधिकांश विशेषज्ञों ने लगभग 28.8 अरब डॉलर के घाटे की संभावना जताई थी। व्यापार घाटे में यह कमी मुख्य रूप से आयात में आई गिरावट के कारण दर्ज की गई।
आयात में कमी से संतुलन को मिला सहारा
फरवरी में आयात का कुल मूल्य घटकर 63.71 अरब डॉलर रह गया, जो जनवरी में 71.24 अरब डॉलर था। इस प्रकार एक महीने के भीतर आयात में लगभग ग्यारह प्रतिशत की कमी देखी गई। मंत्रालय के अनुसार औद्योगिक कच्चे माल और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की मांग बनी रही, लेकिन कुल आयात बिल में कमी यह संकेत देती है कि वर्ष की शुरुआत में तेजी से की जा रही वस्तुओं की भंडारण प्रक्रिया अब कुछ धीमी पड़ गई है।
निर्यात लगभग स्थिर, वैश्विक मांग में सुस्ती
दूसरी ओर निर्यात में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं देखा गया। फरवरी में निर्यात 36.61 अरब डॉलर रहा, जो जनवरी के 36.56 अरब डॉलर के लगभग बराबर है। हालांकि वार्षिक आधार पर यह आंकड़ा पिछले वर्ष फरवरी के 36.91 अरब डॉलर से थोड़ा कम रहा। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक बाजारों में भारतीय वस्तुओं की मांग में अभी अपेक्षित तेजी नहीं आई है।
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ सकती हैं नई चुनौतिया
विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापार घाटे में आई यह कमी लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकती। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से आने वाले महीनों में व्यापार लागत बढ़ने की संभावना है। यह क्षेत्र भारत की ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और किसी भी प्रकार का व्यवधान देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।
ऊर्जा आयात पर भारत की निर्भरता
भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग अस्सी प्रतिशत और रसोई गैस का लगभग साठ प्रतिशत आयात करता है। इनमें से लगभग आधी आपूर्ति पश्चिम एशिया के इसी समुद्री मार्ग से होकर आती है। यदि इस क्षेत्र में संकट गहराता है तो तेल की कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति में बाधा का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
निर्यातकों के सामने बढ़ती लागत की चुनौती
वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार निर्यातकों ने पहले ही माल ढुलाई दरों और बीमा प्रीमियम में संभावित वृद्धि को लेकर चिंता व्यक्त की है। विशेष रूप से चावल जैसे कृषि उत्पादों की आपूर्ति, जो ईरान, इराक और सऊदी अरब जैसे बाजारों में भेजी जाती है, परिवहन संबंधी चुनौतियों का सामना कर सकती है। ऐसे में आने वाले महीनों में व्यापारिक गतिविधियों पर भू-राजनीतिक परिस्थितियों का प्रभाव और स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।
Comments (0)