रायपुर। छत्तीसगढ़ में न्यायालय की अवमानना के बढ़ते मामलों को लेकर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधि मंत्री मोहम्मद अकबर ने राज्यपाल को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने दावा किया है कि पिछले पांच वर्षों में हाईकोर्ट में सात हजार से अधिक अवमानना प्रकरण दर्ज हुए हैं, जिनमें वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान मामलों की संख्या अधिक रही है। वहीं, कांग्रेस के आरोपों के बीच राज्य सरकार ने न्यायालयीन मामलों और अवमानना प्रकरणों की समीक्षा के लिए 26 जुलाई को बैठक बुलाने का फैसला किया है।
पांच वर्षों के आंकड़ों का हवाला
पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर ने अपने पत्र में कहा है कि वर्ष 2025 में हाईकोर्ट में 1884 अवमानना प्रकरण दर्ज हुए, जबकि वर्ष 2026 में अब तक 744 मामले सामने आ चुके हैं। उनका दावा है कि पिछले पांच वर्षों में कुल सात हजार से अधिक अवमानना के मामले दर्ज हुए हैं।
अकबर के मुताबिक, वर्तमान भाजपा सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में 4606 अवमानना प्रकरण दर्ज हुए, जबकि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के पांच वर्षों में यह संख्या 3774 रही। उन्होंने कहा कि न्यायालयीन आदेशों का पालन सुनिश्चित करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसके लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
कांग्रेस ने उठाए जवाबदेही के सवाल
मोहम्मद अकबर ने राज्यपाल से न्यायालयीन आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन, अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और नियमित निगरानी व्यवस्था लागू करने की मांग की है। उनका कहना है कि अदालतों के आदेशों की अनदेखी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
वहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री शिव डहरिया ने भी अवमानना के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए सरकार से जवाब मांगा है।
सरकार ने बुलाई समीक्षा बैठक
कांग्रेस के आरोपों के बीच राज्य सरकार ने भी इस मामले में सक्रियता दिखाई है। विधि विभाग ने 26 जुलाई को न्यायालयीन मामलों और अवमानना प्रकरणों की समीक्षा के लिए बड़ी बैठक बुलाने की तैयारी की है।
सरकार का कहना है कि अदालतों में समय पर जवाब प्रस्तुत करने के लिए सभी विभागों में अलग-अलग लीगल सेक्शन बनाए गए हैं। समीक्षा बैठक में लंबित मामलों, न्यायालयीन आदेशों के पालन और अवमानना प्रकरणों की वर्तमान स्थिति पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
राजनीतिक आरोपों के बीच बड़ा सवाल
न्यायालय की अवमानना के बढ़ते मामलों को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष इसे प्रशासनिक लापरवाही और न्यायालयीन आदेशों की अनदेखी का परिणाम बता रहा है, जबकि सरकार समीक्षा और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की बात कह रही है। अब सभी की नजर 26 जुलाई को होने वाली समीक्षा बैठक पर टिकी है।