पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने देश में रसोई गैस की बढ़ती किल्लत पर तीखा हमला बोला है। पूर्व सीएम कमलनाथ ने कहा देश के कई हिस्सों में रसोई गैस की भारी किल्लत ने आम लोगों की ज़िंदगी को मुश्किल बना दिया है। अखबारों की सुर्खियों में साफ दिखाई दे रहा है कि गैस एजेंसियों पर लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई हैं, लोग घंटों इंतजार कर रहे हैं, और कई जगहों पर सिलेंडर मिलने में कई-कई दिनों की देरी हो रही है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि एक सेकंड में हजारों बुकिंग होने से सर्वर तक क्रैश हो रहे हैं। यह दृश्य किसी आपातकाल जैसी स्थिति का अहसास कराता है।
गैस एजेंसियों पर लगी ये लंबी कतारें किस बात की गवाही दे रही हैं?
लेकिन हैरानी की बात यह है कि जब जनता इस संकट से जूझ रही है, तब सरकार के मंत्री और अधिकारी बयान दे रहे हैं कि “कोई किल्लत नहीं है”। सवाल यह है कि अगर किल्लत नहीं है तो गैस एजेंसियों पर लगी ये लंबी कतारें किस बात की गवाही दे रही हैं? आखिर क्यों लोगों को एक सिलेंडर के लिए घंटों धूप में खड़ा रहना पड़ रहा है?
पहले इनकार, फिर सफाई
असल में यह सरकार की पुरानी आदत बन चुकी है सच्चाई से मुंह मोड़ लेना। जब भी कोई संकट सामने आता है, सरकार समस्या स्वीकार करने के बजाय बयानबाज़ी में लग जाती है। पहले इनकार, फिर सफाई, और आखिर में जिम्मेदारी से बचने की कोशिश यही इस सरकार की कार्यशैली बन चुकी है।रसोई गैस जैसी बुनियादी जरूरत पर भी अगर हालात इतने खराब हो जाएं कि लोगों को लाइन में लगकर सिलेंडर का इंतजार करना पड़े, तो यह केवल आपूर्ति की समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक नाकामी का स्पष्ट प्रमाण है। किसी भी जिम्मेदार सरकार का पहला कर्तव्य होता है कि वह संकट को स्वीकार करे और तुरंत समाधान की दिशा में काम करे।
लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। जनता परेशान है, घरों की रसोई ठंडी पड़ रही है, होटल-ढाबों तक में गैस का स्टॉक कम हो रहा है और सरकार कह रही है कि कोई समस्या ही नहीं है। यह रवैया न केवल असंवेदनशील है बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही के भी खिलाफ है।सरकार के इस तरह के बयान जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसे हैं। जो लोग घंटों लाइन में खड़े होकर गैस लेने की कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए यह सुनना कि “कोई किल्लत नहीं है” बेहद अपमानजनक लगता है।
जनता की परेशानी को स्वीकार करना और तत्काल प्रभावी कदम उठाना
सच्चाई यह है कि संकट से आंखें मूंद लेने से समस्या खत्म नहीं होती। जिम्मेदार शासन का मतलब है हालात को समझना, जनता की परेशानी को स्वीकार करना और तत्काल प्रभावी कदम उठाना।अगर सरकार अब भी वास्तविकता से मुंह मोड़ती रही, तो यह सिर्फ गैस की किल्लत का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यह जनता के भरोसे के संकट में बदल जाएगा। और जब जनता का भरोसा टूटता है, तो किसी भी सरकार के लिए उससे बड़ा संकट कोई नहीं होता।
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