वाशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को भारतीय मूल के मतदाताओं के बीच पहले मिली राजनीतिक स्वीकार्यता अब कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप ने इस समुदाय के एक हिस्से का समर्थन हासिल किया था, लेकिन उनके दूसरे कार्यकाल की नीतियों और बयानों ने कई मतदाताओं को फिर से डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर आकर्षित किया है। भारत के साथ संबंधों को लेकर पैदा हुई असहजता, आव्रजन नीतियों में सख्ती और भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ बढ़ती नस्ली टिप्पणियों ने इस बदलाव को गति दी है। हालिया चुनावी रुझान बताते हैं कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय अब केवल वैचारिक या पार्टीगत पहचान के आधार पर मतदान करने के बजाय अपने सामाजिक, आर्थिक और सामुदायिक हितों को भी प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि, इसे पूरे समुदाय की एकसमान राजनीतिक राय मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि उसके भीतर विचारों और प्राथमिकताओं की विविधता बनी हुई है।
पाकिस्तान के प्रति ट्रंप का रुख बना असंतोष की बड़ी वजह
भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर ट्रंप प्रशासन के रुख ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय के एक हिस्से में सवाल खड़े किए हैं। विशेष रूप से ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने का श्रेय लेने तथा बार-बार मध्यस्थता का दावा करने संबंधी ट्रंप के बयानों को भारत में असहजता के साथ देखा गया। भारत का पारंपरिक रुख रहा है कि पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय मुद्दों का समाधान दोनों देशों के बीच ही होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है। दूसरी ओर, पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के साथ ट्रंप की मुलाकातों और सार्वजनिक निकटता ने भी भारतीय मूल के कुछ अमेरिकी नागरिकों के बीच नाराजगी पैदा की। उनके लिए यह केवल विदेश नीति का सवाल नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्थिति और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा विषय है। ट्रंप के पहले कार्यकाल में भारत के प्रति दिखाई देने वाली सकारात्मक राजनीतिक गर्मजोशी और दूसरे कार्यकाल के कुछ फैसलों के बीच अंतर ने इस असंतोष को और गहरा किया है।
भारत विरोधी टिप्पणियों और नस्ली बयानबाजी ने बढ़ाई नाराजगी
भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के रुख में बदलाव की एक महत्वपूर्ण वजह अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ बढ़ती नस्ली टिप्पणियां भी हैं। ट्रंप के राजनीतिक आंदोलन मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (एमएजीए) से जुड़े कुछ समर्थकों की बयानबाजी ने इस समुदाय में असुरक्षा और असंतोष की भावना पैदा की है। इसका चर्चित उदाहरण टेक्सस में सामने आया, जहां रिपब्लिकन उम्मीदवार बो फ्रेंच ने टेक्सस विश्वविद्यालय के दक्षिण एशियाई मूल के विद्यार्थियों की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करते हुए अमेरिकी विश्वविद्यालयों में विदेशी लोगों की अधिक मौजूदगी पर सवाल उठाया था। इस टिप्पणी को भारतीय मूल के विद्यार्थियों और दक्षिण एशियाई समुदायों ने अपमानजनक माना। विवाद इसलिए भी बढ़ा क्योंकि तस्वीर में दिखाई देने वाले सभी लोगों की नागरिकता जाने बिना उन्हें विदेशी बताने की कोशिश की गई थी। टेक्सस के कई रिपब्लिकन नेताओं ने भी इस बयान की आलोचना की। इस घटना ने अमेरिका में भारतीयों की पहचान, नागरिकता, सामाजिक स्वीकार्यता और उनके योगदान को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी।
एच-1बी वीजा पर सख्ती से भारतीय पेशेवरों की बढ़ी चिंता
अमेरिका की आव्रजन नीति भी भारतीय-अमेरिकी समुदाय के राजनीतिक रुझान को प्रभावित करने वाला प्रमुख मुद्दा बन गई है। बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर एच-1बी वीजा के माध्यम से अमेरिकी कंपनियों, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीकी क्षेत्रों में काम करते हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान विदेशी कुशल कर्मचारियों की नियुक्ति, वीजा नियमों और रोजगार संबंधी प्रक्रियाओं को लेकर सख्त रुख अपनाया गया। इससे भारतीय पेशेवरों के साथ उनके परिवारों और अमेरिका में स्थायी भविष्य की उम्मीद रखने वाले युवाओं के बीच भी चिंता बढ़ी है। अमेरिकी राजनीति में विदेशी कर्मचारियों को स्थानीय नागरिकों की नौकरियों के लिए चुनौती बताने वाली बयानबाजी ने इस आशंका को और मजबूत किया है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस सहित कुछ रिपब्लिकन नेताओं की ओर से विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर उठाए गए सवालों ने भी इस बहस को राजनीतिक रंग दिया। भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के लिए अब यह महत्वपूर्ण हो गया है कि कौन-सी पार्टी उनके रोजगार, पेशेवर अवसरों और आव्रजन संबंधी हितों को बेहतर सुरक्षा प्रदान कर सकती है।
कार्नेगी-यूगोव सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक पार्टी को बड़ी बढ़त
भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बदलते राजनीतिक रुझान की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस और शोध संस्था यूगोव के संयुक्त सर्वेक्षण में सामने आई है। अक्टूबर 2026 में किए गए इस अध्ययन में भारतीय मूल के 1,000 अमेरिकी वयस्कों को शामिल किया गया था। सर्वेक्षण 7 से 27 अक्टूबर के बीच कराया गया। इसमें अमेरिकी नागरिकों के बीच प्रतिनिधि सभा के चुनाव में मतदान की मंशा से जुड़े आंकड़ों के अनुसार 62 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को समर्थन देने की बात कही, जबकि केवल 19 प्रतिशत ने रिपब्लिकन उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने की इच्छा जताई। 12 प्रतिशत मतदाता अनिर्णीत रहे, 5 प्रतिशत ने मतदान नहीं करने की बात कही और 2 प्रतिशत ने अन्य उम्मीदवारों का समर्थन किया। सीनेट चुनाव वाले राज्यों में भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 63 प्रतिशत और रिपब्लिकन उम्मीदवारों को 21 प्रतिशत समर्थन मिलने की बात सामने आई। यह सर्वेक्षण चुनाव से पहले की मतदान मंशा को दर्शाता है, न कि वास्तविक मतदान के अंतिम परिणाम को।
2024 के चुनाव से 2026 तक कितना बदला राजनीतिक समीकरण?
भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के राजनीतिक रुझान में आए बदलाव को समझने के लिए पिछले चुनावों के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में 62 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकियों ने कमला हैरिस का समर्थन किया था, जबकि 30 प्रतिशत मतदाताओं ने डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में रुख अपनाया था। जनवरी 2026 के सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक समर्थन घटकर 57 प्रतिशत रह गया था, जबकि ट्रंप के प्रति समर्थन 25 प्रतिशत तक पहुंच गया था। लेकिन अक्टूबर 2026 के नए सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के समर्थन की मंशा फिर बढ़कर 62 प्रतिशत हो गई। खास बात यह है कि 40 वर्ष से अधिक आयु के भारतीय-अमेरिकी पुरुषों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों का समर्थन जनवरी के 53 प्रतिशत से बढ़कर 68 प्रतिशत हो गया, जबकि रिपब्लिकन समर्थन 32 प्रतिशत से घटकर 16 प्रतिशत रह गया। इसके बावजूद पार्टीगत पहचान में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। सर्वेक्षण के अनुसार 46 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी स्वयं को डेमोक्रेट, 19 प्रतिशत रिपब्लिकन और 26 प्रतिशत स्वतंत्र मतदाता मानते हैं। इससे संकेत मिलता है कि कई मतदाताओं का मतदान संबंधी निर्णय उनकी स्थायी राजनीतिक पहचान से अलग दिशा में भी जा सकता है।
रिपब्लिकन पार्टी के लिए भारतीय-अमेरिकी समुदाय का संदेश
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों और भारतीय-अमेरिकी समुदाय के राजनीतिक रुझान में आए बदलाव को रिपब्लिकन पार्टी के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की संख्या भले ही अमेरिका की कुल आबादी का लगभग 1.5 प्रतिशत है, लेकिन कई निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी राजनीतिक और सामाजिक भूमिका महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से न्यू जर्सी, टेक्सस, कैलिफोर्निया और अन्य राज्यों में भारतीय समुदाय की उपस्थिति चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। 2026 के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को जिन राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, उनके बीच भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं की नाराजगी ने भी ध्यान खींचा है। हालांकि, कार्नेगी के अध्ययन के अनुसार डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों का समर्थन करने वाले सभी मतदाता पार्टी के स्थायी समर्थक नहीं हैं। इनमें एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो मुख्य रूप से रिपब्लिकन उम्मीदवारों और उनकी नीतियों के विरोध में डेमोक्रेटिक विकल्प चुन रहा है। ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी के सामने चुनौती केवल चुनावी समर्थन वापस हासिल करने की नहीं, बल्कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच विश्वास, सामाजिक स्वीकार्यता और नीतिगत भरोसा बहाल करने की भी है।