अमेरिका के एक फेडरल ट्रेड कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए 10% ग्लोबल टैरिफ को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि इतने बड़े पैमाने पर आयात शुल्क लगाने के लिए प्रशासन के पास कांग्रेस की मंजूरी नहीं थी। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने कहा कि 2026 की शुरुआत में लगाए गए ये टैरिफ कानूनन अमान्य हैं।
ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 का दिया गया था हवाला
ट्रम्प प्रशासन ने अपने फैसले को सही ठहराने के लिए ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 का हवाला दिया था। प्रशासन का तर्क था कि अमेरिका 1.2 ट्रिलियन डॉलर के व्यापार घाटे और GDP के 4% के बराबर करंट अकाउंट डेफिसिट का सामना कर रहा है।
हालांकि कोर्ट ने कहा कि केवल व्यापार घाटा होना इस कानून के इस्तेमाल के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी जिक्र
कोर्ट ने यह भी माना कि राष्ट्रपति की इमरजेंसी आर्थिक शक्तियां असीमित नहीं हैं। इससे पहले भी अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ट्रम्प प्रशासन के कुछ टैरिफ फैसलों पर सवाल उठा चुका है।
छोटे व्यापारियों ने कोर्ट में दलील दी थी कि नया 10% टैरिफ आदेश सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों को दरकिनार करने की कोशिश था।
छोटे कारोबारियों ने फैसले का किया स्वागत
ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भर अमेरिकी कंपनियों ने इस फैसले का स्वागत किया है। बेसिक फन कंपनी के CEO जे मय फोरमैन ने इसे अमेरिकी कारोबारियों की बड़ी जीत बताया।
उन्होंने कहा कि गैर-कानूनी टैरिफ की वजह से कंपनियों के लिए बाजार में टिके रहना मुश्किल हो रहा था।
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
ट्रम्प प्रशासन भारत समेत कई देशों के साथ व्यापारिक टैरिफ को लेकर सख्त रुख अपनाता रहा है। ऐसे में अमेरिकी कोर्ट के इस फैसले से भारतीय निर्यातकों को राहत मिल सकती है।
इससे भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में पहुंच आसान बनी रह सकती है और अतिरिक्त लागत बढ़ने का खतरा कम होगा।
अब आगे क्या?
माना जा रहा है कि ट्रम्प प्रशासन इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकता है। मामला पहले United States Court of Appeals for the Federal Circuit में जाएगा और जरूरत पड़ने पर फिर से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है।
क्या है Trade Act 1974 की धारा 122?
इस प्रावधान के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को 150 दिनों तक अस्थायी टैरिफ लगाने का अधिकार होता है, लेकिन इसका इस्तेमाल केवल गंभीर भुगतान संतुलन संकट या मुद्रा स्थिरता के खतरे की स्थिति में ही किया जा सकता है।