नई दिल्ली. देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की हालिया रिपोर्ट ने एक गंभीर सच्चाई सामने रखी है। इसके अनुसार भारत में लगभग 40 प्रतिशत किशोर और युवा डिसलिपिडेमिया से प्रभावित हैं। यह स्थिति भविष्य में हृदयाघात और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है, जो अब तक केवल वयस्कों से जुड़ी मानी जाती थीं।
कोलेस्ट्रॉल असंतुलन के खतरनाक संकेत
रिपोर्ट में सामने आया है कि लगभग 39.9 प्रतिशत किशोरों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य से अधिक या असंतुलित पाया गया। करीब 28 प्रतिशत बच्चों में एचडीएल-सी, जिसे ‘अच्छा कोलेस्ट्रॉल’ कहा जाता है, की कमी दर्ज की गई। इसके विपरीत शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ रही है, जो धमनियों में रुकावट पैदा कर सकता है और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाता है।
लड़कों में अधिक प्रभाव, लड़कियों में अलग चिंता
अध्ययन के अनुसार यह समस्या लड़कों में अपेक्षाकृत अधिक पाई गई है, जहां लगभग 42 प्रतिशत लड़के असामान्य कोलेस्ट्रॉल से प्रभावित हैं, जबकि लड़कियों में यह आंकड़ा 38 प्रतिशत है। हालांकि लड़कियों में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर अधिक पाया गया, जो भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याओं को जन्म दे सकता है। यह संकेत देता है कि दोनों वर्गों के लिए अलग-अलग स्वास्थ्य रणनीतियों की आवश्यकता है।
बदलती जीवनशैली बनी मुख्य कारण
विशेषज्ञों के अनुसार इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण आधुनिक जीवनशैली है। बच्चों का झुकाव अब पारंपरिक और पौष्टिक आहार से हटकर जंक फूड की ओर बढ़ गया है। पिज्जा, बर्गर, चिप्स और अत्यधिक तली-भुनी चीजें उनकी प्राथमिकता बन चुकी हैं। इसके साथ ही खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों की जगह मोबाइल और टीवी ने ले ली है, जिससे शरीर में वसा का संचय तेजी से बढ़ रहा है।
स्क्रीन टाइम और प्रोसेस्ड फूड का दुष्प्रभाव
बाजार में उपलब्ध प्रोसेस्ड फूड और शीतल पेय पदार्थ बच्चों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं। अत्यधिक स्क्रीन टाइम न केवल शारीरिक गतिविधियों को कम करता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है। यह संयोजन बच्चों को कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रहा है।
सुधार के लिए आवश्यक कदम
डॉक्टरों ने इस स्थिति से बचाव के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। बच्चों के आहार में रोजाना फल और हरी सब्जियों को शामिल करना जरूरी है। जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों का सेवन सीमित करना चाहिए। इसके साथ ही प्रतिदिन कम से कम एक घंटे का शारीरिक व्यायाम या खेल अनिवार्य होना चाहिए। पर्याप्त नींद और मोबाइल के सीमित उपयोग से भी स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सकता है।
जागरूकता ही बचाव का मार्ग
बचपन में ही दिल की बीमारी का खतरा एक गंभीर चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि समय रहते जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और भी गंभीर रूप ले सकती है। इसलिए अभिभावकों और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें और उन्हें स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करें।