लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि युवावस्था ही जिंदगी का सबसे खूबसूरत दौर होती है। लोग अक्सर 20 या 30 की उम्र को ऊर्जा, सफलता और खुशी का प्रतीक मानते हैं। लेकिन ब्रिटेन में हुए एक नए सर्वे ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। अध्ययन में सामने आया कि इंसान असल मायनों में सबसे ज्यादा मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और संतुष्टि 47 साल की उम्र में महसूस करता है।
दो हजार लोगों पर हुए अध्ययन ने चौंकाए नतीजे
ब्रिटेन की संस्था टेपे द्वारा किए गए इस सर्वे में दो हजार से अधिक लोगों को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों से उनकी मानसिक स्थिति, जीवन संतुष्टि, तनाव स्तर और सामाजिक व्यवहार से जुड़े सवाल पूछे गए। परिणामों में यह सामने आया कि 47 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते ज्यादातर लोग जीवन को लेकर अधिक स्पष्ट, शांत और आत्मविश्वासी हो जाते हैं।
40 के बाद क्यों बढ़ने लगती है खुशी?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ मिरांडा पास्कुची के अनुसार, 40 पार करने के बाद लोग धीरे-धीरे उन चीजों से दूरी बना लेते हैं जो अनावश्यक तनाव पैदा करती हैं। इस उम्र में लोग बाहरी दिखावे से ज्यादा अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को महत्व देने लगते हैं। यही बदलाव उन्हें अंदर से अधिक संतुष्ट और खुश महसूस कराता है। सर्वे में शामिल लगभग आधे लोगों ने माना कि 40 के बाद जीवन पहले से ज्यादा सहज और सुखद लगने लगता है।
बदलती जीवनशैली बन रही खुशी की वजह
अध्ययन में यह भी सामने आया कि उम्र बढ़ने के साथ लोगों की जीवनशैली अधिक संतुलित हो जाती है। देर रात तक पार्टी करना, अत्यधिक शराब पीना या बिना वजह सामाजिक दबाव में रहना कम होने लगता है। लगभग 28 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि उन्होंने 40 के बाद ऐसी आदतों में भारी कमी की। इसके बजाय लोग अब पौष्टिक भोजन, नियमित दिनचर्या और बेहतर स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने लगे हैं।
परिवार और अनुभव बढ़ा रहे मानसिक संतुलन
सर्वे के अनुसार इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते लोग रिश्तों और परिवार की अहमियत को ज्यादा गहराई से समझने लगते हैं। बच्चों और परिवार के साथ समय बिताना, नियमित गतिविधियों में शामिल रहना और जीवन के अनुभवों से सीखना मानसिक स्थिरता को मजबूत बनाता है। कई प्रतिभागियों ने कहा कि अब वे दूसरों को खुश करने की बजाय खुद की शांति और संतुष्टि पर ध्यान देना सीख चुके हैं।
आत्मस्वीकृति बनती है सबसे बड़ी ताकत
विशेषज्ञों का मानना है कि 47 साल की उम्र तक इंसान खुद को बेहतर तरीके से स्वीकार करना सीख जाता है। इस पड़ाव पर तुलना और सामाजिक प्रतिस्पर्धा का दबाव कम हो जाता है। लोग अपनी उपलब्धियों, सीमाओं और जीवन की वास्तविकताओं को अधिक सहजता से अपनाने लगते हैं। यही आत्मस्वीकृति उन्हें पहले से ज्यादा खुश और आत्मविश्वासी बनाती है।