केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत की सबसे बड़ी और बहुप्रतीक्षित नदी जोड़ो योजनाओं में से एक मानी जाती है। इस परियोजना के तहत मध्य प्रदेश की केन नदी को बेतवा नदी से जोड़ने की योजना बनाई गई है ताकि बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की कमी की समस्या को कम किया जा सके। लगभग 44,600 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना का 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाने वाली है। वर्षों से सूखे और जल संकट से जूझ रहे बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए यह परियोजना जीवनरेखा मानी जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में हुई बैठक में इस प्रोजेक्ट को लेकर गंभीरता दिखाई और संबंधित राज्यों से कहा कि सभी बाधाओं को दूर कर परियोजना को समय पर पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
क्या है केन नदी और क्यों है इतनी महत्वपूर्ण
केन नदी मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास कैमूर की पहाड़ियों से निकलती है और लगभग 427 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के चिल्ला गांव के पास यमुना नदी में जाकर मिल जाती है। यह नदी बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत मानी जाती है। केन नदी और इसकी सहायक नदियों पर पहले से पांच बड़े बांध बनाए जा चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केन नदी में उपलब्ध अतिरिक्त जल का उपयोग यदि सही तरीके से किया जाए तो पानी की कमी वाले क्षेत्रों को बड़ी राहत मिल सकती है। यही सोच इस परियोजना की मूल अवधारणा का आधार बनी।
बेतवा नदी का बुंदेलखंड से गहरा संबंध
बेतवा नदी मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से निकलती है और लगभग 576 किलोमीटर की यात्रा के बाद उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में यमुना नदी में मिल जाती है। यह नदी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिलों के लिए सिंचाई और पेयजल का प्रमुख स्रोत है। बेतवा और इसकी सहायक नदियों पर कुल 24 बांध बनाए जा चुके हैं। हालांकि बुंदेलखंड क्षेत्र में वर्षा की अनिश्चितता और जल संकट के कारण बेतवा नदी के जल संसाधनों पर लगातार दबाव बढ़ता रहा है। ऐसे में केन नदी का अतिरिक्त पानी बेतवा तक पहुंचाने की योजना को लंबे समय से महत्वपूर्ण समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
छतरपुर में बनेगा परियोजना का सबसे अहम केंद्र
केन और बेतवा नदियों को मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के डोढन गांव में लिंक किया जाएगा। यहां गंगऊ बांध के ऊपर डोढन बांध बनाया जाना प्रस्तावित है। इसी क्षेत्र में पावरहाउस भी स्थापित किए जाएंगे, जिनसे लगभग 78 मेगावाट बिजली उत्पादन होने की उम्मीद है। परियोजना के तहत करीब 220 किलोमीटर लंबी नहर तैयार की जाएगी, जिसके जरिए पानी उत्तर प्रदेश के झांसी स्थित बरुआसागर तालाब तक पहुंचाया जाएगा। वहां से यह पानी बेतवा नदी पर बने पारीछा बांध तक जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरी संरचना बुंदेलखंड क्षेत्र में जल वितरण व्यवस्था को पूरी तरह बदल सकती है।
6 लाख हेक्टेयर खेतों को मिलेगा पानी
इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ कृषि क्षेत्र को मिलने की उम्मीद है। योजना के अनुसार केन नदी से लगभग 1074 एमसीएम पानी बेतवा नदी प्रणाली तक पहुंचाया जाएगा। इसमें से करीब 266 एमसीएम पानी नहरों के जरिए मध्य प्रदेश के पन्ना, टीकमगढ़ और छतरपुर तथा उत्तर प्रदेश के झांसी, बांदा और महोबा जिलों के लगभग 6 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र तक पहुंचेगा। इससे लंबे समय से सूखे और अस्थिर मानसून की मार झेल रहे किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिंचाई सुविधा बेहतर होने से कृषि उत्पादन बढ़ेगा और बुंदेलखंड की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
पानी के साथ बिजली और पेयजल व्यवस्था में भी सुधार
केन-बेतवा परियोजना केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है बल्कि इसका असर बिजली और पेयजल आपूर्ति पर भी दिखाई देगा। परियोजना के तहत बनने वाले पावरहाउस से बिजली उत्पादन होगा, जिससे क्षेत्रीय ऊर्जा जरूरतों को आंशिक सहायता मिल सकेगी। इसके अलावा बेतवा नदी में जल उपलब्धता बढ़ने से विदिशा और रायसेन जैसे जिलों में पानी की व्यवस्था बेहतर होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना पूरी होने के बाद कई शहरों और गांवों में पेयजल संकट कम किया जा सकता है।
आखिर क्यों अटकी हुई है परियोजना
हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सामने कई चुनौतियां भी हैं। पर्यावरणीय मंजूरी, वन क्षेत्र पर प्रभाव, विस्थापन और राज्यों के बीच जल बंटवारे जैसे मुद्दों को लेकर लंबे समय से विवाद बना हुआ है। विशेष रूप से पन्ना टाइगर रिजर्व के कुछ हिस्सों पर संभावित प्रभाव को लेकर पर्यावरणविद लगातार चिंता जताते रहे हैं। इसके अलावा परियोजना की लागत और निर्माण समयसीमा भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। यही वजह है कि वर्षों से चर्चा में रहने के बावजूद यह योजना अब तक पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाई है।
पीएम मोदी क्यों दिखा रहे हैं विशेष गंभीरता
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस परियोजना को केवल एक नदी जोड़ो योजना नहीं बल्कि बुंदेलखंड के सामाजिक और आर्थिक बदलाव के बड़े माध्यम के रूप में देख रहे हैं। जल संकट, पलायन और कृषि समस्याओं से जूझ रहे क्षेत्र के लिए यह परियोजना गेमचेंजर साबित हो सकती है। यही कारण है कि केंद्र सरकार इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय महत्व की योजना मानते हुए तेजी से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। अब देखना यह होगा कि राज्यों और केंद्र के बीच समन्वय बनाकर इस महत्वाकांक्षी परियोजना को कितनी तेजी से धरातल पर उतारा जा सकता है।