भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की बात आते ही अजीत कुमार डोभाल का नाम सबसे पहले लिया जाता है। 20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में जन्मे डोभाल आज 81 वर्ष के हैं, लेकिन उनकी रणनीतिक सूझबूझ और निर्णय क्षमता आज भी उतनी ही प्रभावशाली मानी जाती है। खुफिया अभियानों से लेकर कूटनीतिक संकटों तक, उन्होंने हर मोर्चे पर भारत की सुरक्षा को निर्णायक दिशा दी है।
देश के इतिहास का सबसे लंबा NSA कार्यकाल
31 मई 2014 से अजीत डोभाल भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) हैं। लगातार तीसरे कार्यकाल में इस पद पर बने रहना अपने आप में उनकी दक्षता और सरकार के भरोसे का प्रमाण है। 2019 में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति निर्धारण में उनकी भूमिका केवल सलाहकार तक सीमित नहीं, बल्कि निर्णायक है।
आर्मी परिवार से IPS तक का अनुशासित सफर
डोभाल का पालन-पोषण एक सैन्य वातावरण में हुआ। उनके पिता भारतीय सेना में अधिकारी थे, जिससे अनुशासन और राष्ट्रसेवा उनके संस्कारों में रची-बसी।
मिलिट्री स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा, आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक और 1968 में केरल कैडर से IPS—यह यात्रा उनके बौद्धिक और प्रशासनिक आधार को दर्शाती है। उनकी पहली पोस्टिंग कोट्टायम और फिर थालास्सेरी में ASP के रूप में हुई, जहां उन्होंने जमीन पर नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया।
दंगों से निपटने में दिखाई रणनीतिक समझ
थालास्सेरी में हिंदू-मुस्लिम दंगों के दौरान डोभाल ने परंपरागत बल प्रयोग के बजाय ग्राउंड इंटेलिजेंस और संवाद का रास्ता चुना। उन्होंने दंगों की असली वजह को समझा, लूटा गया सामान वापस दिलवाया और महज एक सप्ताह में हालात सामान्य कर दिए। यह घटना बताती है कि उनकी सोच केवल सुरक्षा नहीं, सामाजिक संतुलन पर भी केंद्रित रही है।
वर्दी से ज्यादा समय खुफिया दुनिया में
1972 में अजीत डोभाल ने Intelligence Bureau जॉइन किया। अपने पूरे करियर में उन्होंने मात्र सात साल वर्दी में बिताए, शेष समय अंडरकवर ऑपरेशंस और खुफिया अभियानों में लगाया। 1988 में उन्हें कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया—यह सम्मान पाने वाले वे एकमात्र पुलिस अधिकारी और सबसे कम उम्र के अफसर हैं।
पाकिस्तान में अंडरकवर जासूसी का साहसिक अध्याय
1980 के दशक में डोभाल करीब सात वर्षों तक पाकिस्तान में मुस्लिम पहचान के साथ अंडरकवर रहे। लाहौर और इस्लामाबाद में रहते हुए उन्होंने भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील जानकारियां जुटाईं। एक अवसर पर उनकी पहचान उजागर होने के कगार पर थी, लेकिन सूझबूझ और साहस से उन्होंने स्वयं को बचाया। इस अनुभव ने उन्हें दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति का गहरा जानकार बनाया।
भारत के सबसे बड़े सुरक्षा अभियानों के सूत्रधार
अजीत डोभाल कई ऐतिहासिक अभियानों से सीधे जुड़े रहे। ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान वे रिक्शा चालक बनकर स्वर्ण मंदिर के भीतर गए। कंधार हाईजैक मामले में वे मुख्य वार्ताकार रहे और 15 से अधिक हाईजैकिंग मामलों के समाधान में भूमिका निभाई। उरी सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक और डोकलाम गतिरोध—इन सभी में उनकी रणनीतिक सोच निर्णायक रही।
प्रधानमंत्री मोदी के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार
अजीत डोभाल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे विश्वसनीय रणनीतिक सलाहकार माना जाता है। वे तकनीक का सीमित उपयोग करते हैं और व्यक्तिगत सुरक्षा नियमों का कठोरता से पालन करते हैं। यही सतर्कता और गोपनीयता उन्हें खुफिया दुनिया का बेजोड़ खिलाड़ी बनाती है।
एक व्यक्ति, अनेक मिशन
अजीत डोभाल केवल एक अधिकारी नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक चेतना का प्रतीक हैं। उनका जीवन यह दिखाता है कि राष्ट्र की सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि बुद्धि, धैर्य और साहस से सुनिश्चित होती है। यही कारण है कि वे आज भी भारत के ‘जेम्स बॉन्ड’ कहे जाते हैं।
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