गाजीपुर: राजनीति के खिलाड़ी माने जाने वाले बसपा सांसद अफजाल अंसारी (Afzal Ansari) के सफेद-कुर्ते पैजामे पर पहली बार पर अपराध में सजा का बुदनुमा दाग लगा है। कृष्णानंद राय हत्याकांड में बरी होने के कारण वह अब तक राजनीति में अपने को बेदाग बताते रहे। गैंगस्टर के मामले में कोर्ट से चार साल की सजा सुनाने के बाद उनकी 37 साल की लंबी राजनीति पर विराम लगता दिख रहा है।
सरयू पांडेय के साथ शुरू किया राजनीतिक सफर
कम्युनिष्ट नेता सरयू पांडेय के साथ चलकर राजनीतिक शुरू करने वाले अफजाल अंसारी ने 1985 में पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा था और सफलता हासिल की थी। वह पांच बार विधायक व दो बार सांसद चुने गए हैं। अब तक के 37 साल की राजनीति में वह बेदाग होने की बेबाक कहते रहे हैं। लेकिन एमपी-एमएलए कोर्ट से हुई सजा ने उनकी बेबाकी बोल पर विराम लगा दिया है। अब तक वह अंसारी परिवार के लिए वटवृक्ष की तरह है।
"मुख्तार के राजनीतिक कवच बनकर रहे"
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चाहे वह कितना भी सफाई क्यों न दें, लेकिन माफिया मुख्तार अंसारी को राजनीतिक तौर पर उनका पूरा संरक्षण मिला। उनकी छत्रछाया में मुख्तार ने अपराध के साथ-साथ राजनीति में अपना दबदबा बनाया। वह पग-पग पर मुख्तार के लिए राजनीतिक कवच बनकर रहे। सूबे में सपा हो या बसपा किसी भी सरकार में रसूख की बदौलत वह अपने राजनीतिक साम्राज्य को बढ़ाते रहे। उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी चाणक्य नीति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने परिवार की नई पीढ़ी के सुहैब अंसारी व अब्बास अंसारी को पिछले विधान चुनाव में विधायक बनवाने में कामयाब हो गए। अब इस फैसले के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल खड़ा हो गया है।
कुछ ऐसा है अफजाल अंसारी का राजनीतिक सफर
सांसद अफजाल अंसारी (Afzal Ansari) वैसे तो छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़े हुए थे लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति वर्ष 1985 के विधान सभा चुनाव से किए। पहली बार वह वर्ष 1985 में भाकपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीतकर विधायक बने। इसके बाद उनका जीत का सिलसिला 1989, 91,93 व 96 तक चलता रहा। वर्ष 2002 के विधान सभा चुनाव में वह भाजपा के कृष्णानंद राय से चुनाव हार गए। वह वर्ष 1993,96 व 2002 का चुनाव सपा के टिकट पर लड़े।
विधान सभा चुनाव हारने के बाद पार्टी ने उन्हें वर्ष 2004 में लोकसभा का टिकट दिया। इस चुनाव में भाजपा के मनोज सिन्हा को हरा दिया। इस बीच 29 नवंबर 2005 को विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के बाद जेल चले गए। जेल जाने के दौरान सपा से राजनीतिक मतभेद होने के बाद वह वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव बसपा के टिकट पर लड़े और हार गए। इसके पश्चात उन्होंने अपना निजी कौमी एकता दल बनाया। वर्ष 2014 में बलिया संसदीय सीट से चुनाव लड़े और फिर हार गए। वह 2019 में गाजीपुर संसदीय सीट से बसपा-सपा गठबंधन से चुनाव लड़े और तत्कालीन केंद्रीय रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा को हरा दिया।
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