भागलपुर: भागलपुर में गंगा नदी के उफान और बाढ़ के पानी ने तटीय शहरी इलाकों में पेयजल संकट को विकराल बना दिया है। गंगा किनारे बसे दर्जनों मोहल्लों में चापाकल और घरेलू बोरिंग से साफ पानी की जगह कीचड़युक्त और दुर्गंध वाला पानी निकल रहा है। बाढ़ का पानी जमीन में रिसने और लंबे समय तक जलजमाव रहने से भूमिगत जलस्रोत भी प्रभावित हुए हैं। इसका सबसे ज्यादा असर निम्नवर्गीय और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली आबादी पर पड़ा है। सरकारी स्तर पर पर्याप्त टैंकर उपलब्ध नहीं होने से लोगों की परेशानी और बढ़ गई है। कई परिवार मजबूरी में दूषित पानी को उबालकर पी रहे हैं। वहीं, मध्यमवर्गीय परिवारों को रोजाना जार का पानी खरीदने के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। शहर में स्वच्छ पेयजल की मांग अचानक बढ़ने से जल संकट गंभीर रूप लेता जा रहा है।
गंगा किनारे के दर्जनों मोहल्लों में बोरिंग फेल, निकल रहा दुर्गंधयुक्त पानी
गंगा के जलस्तर में बढ़ोतरी और बाढ़ के पानी के सीपेज ने शहर के कई इलाकों के जलस्रोतों को प्रभावित किया है। साहेबगंज, मोहनपुर, सराय, रिकाबगंज और कंपनीबाग समेत कई मोहल्लों में चापाकल से गंदा पानी निकल रहा है। बूढ़ानाथ, सखीचंद घाट, कसबा गोलाघाट और किलाघाट जैसे इलाकों में भी लोगों को पेयजल के लिए परेशानी झेलनी पड़ रही है। मानिक सरकार घाट, आदमपुर घाट, बैंक कॉलोनी, कोयलाघाट, कालीघाट और बरारी घाट में भी स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक पानी में मिट्टी और गंदगी के साथ तेज दुर्गंध भी आ रही है। कई घरों में घरेलू बोरिंग का पानी पीने लायक नहीं रह गया है। इससे लोगों को वैकल्पिक जलस्रोतों पर निर्भर होना पड़ रहा है। बाढ़ का पानी कम होने के बाद भी जलस्रोतों के सामान्य होने में समय लगने की आशंका है।
चंपा नाला और हथिया नाला के बढ़ते जलस्तर से बढ़ी परेशानी
चंपा नाला और हथिया नाला के आसपास रहने वाले लोगों की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। चंपा नाला पुल के पास बुनकर प्रतिनिधि हाजी मेराजुद्दीन के मुताबिक, घरों में बाढ़ का पानी घुसने और लंबे समय तक जमा रहने से चापाकल दूषित पानी देने लगे हैं। स्थानीय लोग इस पानी को मजबूरी में उबालकर इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता अमित सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय परिसर से निकलने वाले हथिया नाला में जलस्तर बढ़ने के साथ आसपास की बोरिंग से दुर्गंध आने लगती है। नाले का पानी जमीन में रिसने से भूमिगत जल के प्रदूषित होने की आशंका बढ़ गई है। इससे इलाके में साफ पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सामान्य जलस्रोतों से पानी लेना अब सुरक्षित नहीं रह गया है। प्रशासन से तत्काल वैकल्पिक पेयजल व्यवस्था उपलब्ध कराने की मांग की जा रही है।
टैंकरों की कमी, झुग्गी बस्तियों में दूषित पानी पीने की मजबूरी
पेयजल संकट के बीच प्रभावित इलाकों में सरकारी टैंकरों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की शिकायत सामने आ रही है। दीपनगर झुग्गी बस्ती के स्थानीय नागरिक राज के अनुसार, इलाके में नगर निगम या प्रशासन की ओर से नियमित पानी के टैंकर नहीं पहुंच रहे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सामने साफ पानी खरीदना भी बड़ी चुनौती है। ऐसे में कई लोग आसपास उपलब्ध दूषित पानी का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। बाढ़ के दौरान जलस्रोतों के दूषित होने से इन परिवारों के सामने स्वास्थ्य संबंधी खतरा भी बढ़ गया है। स्थानीय लोगों ने प्रभावित बस्तियों में प्राथमिकता के आधार पर टैंकर भेजने की मांग की है। साथ ही चापाकलों की जांच और पानी की गुणवत्ता की निगरानी की भी मांग उठाई गई है। लोगों का कहना है कि राहत कार्यों में भोजन के साथ स्वच्छ पेयजल को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
शहर में जार वाले पानी की मांग में 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी
पेयजल संकट के कारण भागलपुर में पैकेज्ड और मिनरल वाटर जार की मांग में अचानक तेजी आई है। जार कारोबारियों के मुताबिक, शहर में 100 से अधिक जार पानी के प्लांट संचालित हो रहे हैं। सामान्य दिनों में एक प्लांट से करीब 150 जार की बिक्री होती थी। अब कई प्लांटों पर रोजाना 200 से 400 जार तक की मांग पहुंच रही है। अचानक बढ़ी मांग के कारण कई जगहों पर ग्राहकों की लंबी कतारें लग रही हैं। पानी की अधिक मांग के चलते होम डिलीवरी व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। कई कारोबारी सभी ग्राहकों तक समय पर पानी पहुंचाने में असमर्थ हो रहे हैं। मजबूरी में लोग खुद प्लांट पहुंचकर पानी के जार लेकर घर लौट रहे हैं।
20 लीटर के जार के लिए 25 से 30 रुपये तक खर्च
बाढ़ के कारण साफ पानी की बढ़ती जरूरत ने आम लोगों के घरेलू बजट पर भी असर डाला है। खुले बाजार में 20 लीटर के पानी के जार के लिए करीब 25 से 30 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। जिन परिवारों में रोजाना कई जार की जरूरत पड़ रही है, उनके लिए यह खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। मध्यमवर्गीय परिवारों को भी अब घरेलू बोरिंग या चापाकल के बजाय बाजार के पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है। वहीं गरीब परिवारों के लिए लगातार जार खरीदना आर्थिक रूप से मुश्किल है। मांग बढ़ने के साथ पानी की उपलब्धता भी कई जगह सीमित हो गई है। लोगों को प्लांट तक पहुंचकर खुद पानी लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से सस्ती दर पर सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की मांग की है।
दूषित पानी से डायरिया और जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ा
बाढ़ के दौरान दूषित पानी के इस्तेमाल से जलजनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। गंदे पानी के लगातार सेवन से डायरिया, पेचिश और पीलिया जैसी बीमारियां फैल सकती हैं। दूषित पानी के संपर्क में आने से त्वचा संबंधी संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में बच्चों और बुजुर्गों को लेकर परिवारों की चिंता ज्यादा है। लोगों का कहना है कि सिर्फ पानी उबालकर पीना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जलस्रोतों की भी जांच जरूरी है। स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से प्रभावित क्षेत्रों में नियमित पानी की जांच कराने की मांग की है। साथ ही ब्लीचिंग पाउडर और क्लोरीन की गोलियां उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई गई है। समय रहते स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था नहीं हुई तो स्वास्थ्य संकट और गंभीर हो सकता है।
प्रशासन से तत्काल शुद्ध पेयजल और राहत व्यवस्था की मांग
पेयजल संकट से जूझ रहे लोगों ने जिला प्रशासन और नगर निगम से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। प्रभावित मोहल्लों में पर्याप्त संख्या में पानी के टैंकर भेजने की मांग की जा रही है। लोगों का कहना है कि टैंकरों की नियमित आपूर्ति से दूषित चापाकलों पर निर्भरता कम की जा सकती है। साथ ही बाढ़ प्रभावित इलाकों के चापाकलों और घरेलू बोरिंग के पानी की गुणवत्ता की जांच कराने की जरूरत है। प्रशासन से क्लोरीन की गोलियां और ब्लीचिंग पाउडर भी वितरित करने की मांग की गई है। स्वास्थ्य विभाग को भी प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाढ़ के दौरान स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना राहत कार्यों की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। समय पर कदम उठाकर संभावित जलजनित बीमारी के प्रकोप को रोका जा सकता है।