तमिलनाडु के मयिलादुथुरई जिले के थेरलुंधुर स्थित वेदपुरीश्वरर मंदिर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को चोल काल का एक महत्वपूर्ण शिलालेख मिला है। यह अभिलेख चोल सम्राट राजाराज चोल प्रथम के शासनकाल से संबंधित है और वर्ष 1003 ईस्वी में जारी किया गया था। शिलालेख को मंदिर के अर्धमंडप में स्थित पत्थर के एक खंभे पर दर्ज पाया गया है। करीब एक हजार वर्ष पुराने इस अभिलेख से तत्कालीन मंदिर व्यवस्था, धार्मिक अनुष्ठानों और दान की संस्थागत परंपरा के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आती है। पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि शिलालेख उस समय के सामाजिक और आर्थिक जीवन को समझने के लिए प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध कराता है।
21 कलंजू सोने के दान का विस्तृत उल्लेख
शिलालेख तमिल भाषा में उत्कीर्ण है और इसमें तिरुवझुंतूर की महासभा द्वारा 21 कलंजू सोने के दान का उल्लेख किया गया है। कलंजू उस समय प्रचलित सोने की एक माप इकाई थी, जिसका वजन लगभग 4.5 ग्राम माना जाता है। इस प्रकार यह दान केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी भेंट नहीं था, बल्कि मंदिर की नियमित व्यवस्था को आर्थिक आधार देने वाली एक सुविचारित व्यवस्था का हिस्सा था। अभिलेख में बताया गया है कि यह सोना तिरुक्कदवुदैया नयनार देवता को भोजन अर्पित करने के उद्देश्य से दिया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि चोल काल में मंदिरों को मिलने वाले दान का उपयोग केवल निर्माण या धार्मिक उत्सवों तक सीमित नहीं था, बल्कि दैनिक धार्मिक गतिविधियों को निरंतर चलाने के लिए भी आर्थिक संसाधन सुनिश्चित किए जाते थे।
दान की राशि से ब्याज और दैनिक प्रसाद की व्यवस्था
शिलालेख का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें दान की गई सोने की राशि के उपयोग की स्पष्ट व्यवस्था दर्ज है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों के अनुसार, इस धन से प्राप्त होने वाले ब्याज का इस्तेमाल धान खरीदने और देवता को प्रतिदिन अर्पित किए जाने वाले प्रसाद से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाना था। इससे उस दौर की मंदिर अर्थव्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है, जिसमें मूल धन को सुरक्षित रखते हुए उसके प्रतिफल से नियमित धार्मिक सेवा संचालित की जाती थी। यह व्यवस्था तत्कालीन समाज में मंदिरों की आर्थिक भूमिका और उनके सुव्यवस्थित प्रबंधन की ओर भी संकेत करती है। शिलालेख में दर्ज यह व्यवस्था बताती है कि धार्मिक संस्थानों के संचालन में दीर्घकालिक वित्तीय नियोजन की अवधारणा उस समय भी विकसित थी।
चोल शासकों के अनेक अभिलेखों का महत्वपूर्ण केंद्र है मंदिर
वेदपुरीश्वरर मंदिर में मिला यह अभिलेख अकेला ऐसा प्रमाण नहीं है, जो इस क्षेत्र में चोल शासन की उपस्थिति और प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाता हो। मंदिर परिसर में राजाराज चोल प्रथम के साथ-साथ उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम सहित विभिन्न चोल शासकों के समय के कई शिलालेख पहले से मौजूद हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सहायक पुरालेखविद् पी. टी. नागराजन के अनुसार, इसी मंदिर से चोल शासकों द्वारा जारी किए गए 15 नए शिलालेख दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें कुछ खंडित अभिलेख भी शामिल हैं। इन अभिलेखों का अध्ययन तत्कालीन धार्मिक संस्थाओं, भूमि व्यवस्था, दान परंपरा और स्थानीय प्रशासन के स्वरूप को समझने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकता है। इस दृष्टि से मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के मध्यकालीन इतिहास का एक जीवंत अभिलेखीय केंद्र भी बनकर सामने आता है।
पुराने मंदिरों में लगातार चल रहा अभिलेखों का सर्वेक्षण
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने चोलकालीन और अन्य प्राचीन अभिलेखों की पहचान के लिए तमिलनाडु के पुराने मंदिरों में सर्वेक्षण का काम तेज किया है। अधिकारियों के अनुसार त्रिची, तंजावुर और मयिलादुथुरई जिलों में स्थित ऐतिहासिक मंदिरों का लगातार निरीक्षण किया जा रहा है, ताकि ऐसे शिलालेखों को खोजकर सुरक्षित रूप से दर्ज किया जा सके। पत्थरों और मंदिर स्थापत्य पर उत्कीर्ण ये अभिलेख राजवंशों के इतिहास के साथ-साथ स्थानीय समाज की आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना के बारे में भी महत्वपूर्ण सूचनाएं देते हैं। कई अभिलेख समय के साथ क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, इसलिए उनकी पहचान, प्रतिलिपि तैयार करना और डिजिटल रूप में सुरक्षित करना इतिहास संरक्षण की दृष्टि से बेहद आवश्यक हो गया है। नए सर्वेक्षणों से दक्षिण भारत के मध्यकालीन इतिहास से जुड़े कई ऐसे तथ्य सामने आने की संभावना है, जो अब तक सीमित अभिलेखीय स्रोतों में दर्ज थे।
एक ही महीने में मिले 85 से अधिक नए शिलालेख
पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने अगस्त महीने में तमिलनाडु में किए गए क्षेत्रीय सर्वेक्षणों के दौरान 85 से अधिक नए शिलालेख दर्ज किए हैं। यह संख्या बताती है कि राज्य के प्राचीन मंदिर और ऐतिहासिक संरचनाएं आज भी ऐसे अभिलेखीय प्रमाण अपने भीतर सुरक्षित रखे हुए हैं, जिनका व्यवस्थित अध्ययन बाकी है। इन शिलालेखों में राजाओं के आदेश, धार्मिक दान, भूमि संबंधी व्यवस्थाएं और मंदिरों के संचालन से जुड़े विवरण मिलने की संभावना रहती है। विशेषज्ञों के लिए ऐसे अभिलेख किसी कालखंड के इतिहास को केवल राजवंशों के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि स्थानीय संस्थाओं और सामान्य सामाजिक जीवन के संदर्भ में समझने का अवसर भी प्रदान करते हैं। इस तरह प्रत्येक नया शिलालेख दक्षिण भारत के इतिहास की पहले से उपलब्ध तस्वीर में एक महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ सकता है।
भारत श्री पोर्टल पर उपलब्ध होंगे हजारों अभिलेख
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अब इन पत्थर के शिलालेखों की छापों और उनके पाठ को डिजिटल माध्यम से सुरक्षित करने की दिशा में काम कर रहा है। अधिकारियों के अनुसार भारत श्री पोर्टल पर तमिलनाडु के करीब 28,000 शिलालेखों की छापें उनके प्रतिलेखों के साथ अपलोड की जाएंगी। इससे इतिहास और पुरालेख के क्षेत्र में काम करने वाले शोधकर्ताओं के साथ विद्यार्थियों और आम लोगों को भी इन महत्वपूर्ण स्रोतों तक निशुल्क पहुंच मिल सकेगी। डिजिटल संरक्षण से उन अभिलेखों को भी लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी, जो प्राकृतिक क्षरण या समय के प्रभाव से धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं। चोलकालीन मंदिर से मिला नया शिलालेख इसी व्यापक संरक्षण अभियान का हिस्सा है और यह खोज एक बार फिर बताती है कि भारत के प्राचीन मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सदियों पुराने सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक इतिहास के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी हैं।