नई दिल्ली. रक्षा अधिग्रहण परिषद ने सशस्त्र बलों की परिचालन और युद्धक क्षमता को मजबूत करने के लिए लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये की खरीद योजनाओं को मंजूरी दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई परिषद की बैठक में लड़ाकू विमानों, परिवहन विमानों और हेलीकॉप्टरों की क्षमताएं बढ़ाने से लेकर सेना और नौसेना के लिए आधुनिक प्रणालियों की खरीद से जुड़े प्रस्तावों पर निर्णय लिया गया। इन मंजूरियों में लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल, बहुउद्देश्यीय जैमर, उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर, रडार और विशेष सैन्य वाहनों जैसी प्रणालियां शामिल हैं। फैसले का व्यापक उद्देश्य तीनों सेनाओं की बदलती युद्ध आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकी क्षमता को मजबूत करना है। साथ ही खरीद प्रक्रिया में घरेलू उद्योग की भागीदारी बढ़ाकर रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता को गति देना भी इसके केंद्र में है।
सुखोई-30 एमकेआई की मारक क्षमता बढ़ाने की तैयारी
भारतीय वायुसेना की क्षमता बढ़ाने वाली योजनाओं में रूसी मूल की लंबी दूरी की RVV-BD हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल को सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान के साथ जोड़ने की पायलट परियोजना विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस एकीकरण से विमान को लंबी दूरी पर हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने की अतिरिक्त क्षमता मिल सकती है। आधुनिक हवाई युद्ध में केवल लड़ाकू विमान की गति और गतिशीलता ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि दुश्मन के विमान को उसकी प्रभावी मारक सीमा से पहले निशाना बनाने की क्षमता भी रणनीतिक बढ़त देती है। ऐसे में लंबी दूरी की मिसाइलों का एकीकरण भारतीय वायुसेना की हवाई युद्ध क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। परियोजना के सफल परीक्षण और मूल्यांकन के बाद इसके व्यापक इस्तेमाल की संभावनाओं पर आगे निर्णय लिया जा सकता है।
जमीन से लेकर आसमान तक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता मजबूत होगी
रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भारतीय वायुसेना के लिए जमीन आधारित बहुउद्देश्यीय जैमर की खरीद के प्रस्ताव को भी स्वीकृति प्रदान की है। आधुनिक युद्ध में संचार, रडार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों को बाधित या भ्रमित करने की क्षमता तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां पारंपरिक हथियारों के साथ युद्धक्षेत्र में एक अलग रणनीतिक आयाम जोड़ती हैं। इसके अलावा सेना के लिए उच्च गतिशीलता वाले वाहनों की खरीद को भी मंजूरी दी गई है, जो कठिन भूभाग और चुनौतीपूर्ण परिचालन परिस्थितियों में सैनिकों तथा सैन्य सामग्री की आवाजाही को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। इन दोनों प्रकार की क्षमताओं का विकास भारत की सैन्य तैयारियों को केवल हथियारों की संख्या के बजाय तकनीकी और परिचालन क्षमता के स्तर पर मजबूत करने की दिशा दिखाता है।
नौसेना के लिए रडार और समुद्री गैस टर्बाइन पर जोर
नौसेना की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अरुध्रा रडारों और समुद्री गैस टर्बाइन से संबंधित प्रस्तावों को भी मंजूरी दी गई है। समुद्री क्षेत्र में निगरानी क्षमता आधुनिक नौसैनिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है, क्योंकि समुद्र में आने-जाने वाले विमानों, पोतों और अन्य गतिविधियों की समय रहते पहचान परिचालन निर्णयों को प्रभावित करती है। अरुध्रा जैसे रडार नौसेना की निगरानी और हवाई क्षेत्र की स्थिति को समझने की क्षमता को मजबूत करने में भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ समुद्री गैस टर्बाइन के डिजाइन, विकास और बाद में खरीद से जुड़ा प्रस्ताव देश में महत्वपूर्ण प्रणोदन तकनीक के विकास की दिशा में भी अहम है। इससे नौसैनिक प्लेटफॉर्मों के लिए जरूरी प्रणालियों में घरेलू तकनीकी क्षमता बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
सेना के लिए उन्नत हेलीकॉप्टर और CBRN वाहन
सेना की परिचालन जरूरतों को देखते हुए उन्नत हल्के हेलीकॉप्टरों और रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल तथा परमाणु परिस्थितियों की पहचान और निगरानी करने वाले CBRN टोही वाहनों से संबंधित प्रस्ताव भी मंजूर किए गए हैं। आधुनिक सुरक्षा वातावरण में सेना को केवल पारंपरिक युद्ध के लिए ही नहीं, बल्कि रासायनिक और जैविक खतरों जैसी असामान्य परिस्थितियों के लिए भी तैयार रहना पड़ता है। ऐसे विशेष वाहन प्रभावित क्षेत्रों में खतरनाक पदार्थों की पहचान, निगरानी और स्थिति के आकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वहीं हल्के हेलीकॉप्टर कठिन और ऊबड़-खाबड़ इलाकों में सैनिकों, उपकरणों और आवश्यक सामग्री की तेजी से आवाजाही में उपयोगी साबित हो सकते हैं। इन क्षमताओं का विकास सेना की बहुआयामी परिचालन तैयारी को मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है।
98% खरीद भारतीय उद्योग से करने का लक्ष्य
इन मंजूरियों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने से जुड़ा है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार परिषद द्वारा स्वीकृत कुल Acceptance of Necessity यानी AoN में लगभग 98% खरीद भारतीय उद्योग से किए जाने की योजना है। रक्षा खरीद प्रक्रिया में AoN को किसी सैन्य उपकरण या प्रणाली की खरीद की दिशा में शुरुआती महत्वपूर्ण मंजूरी माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि प्रस्तावित खरीद में घरेलू कंपनियों और भारतीय रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को बड़ी भूमिका मिलने की संभावना है। सरकार लंबे समय से आयात पर निर्भरता कम करने और देश के भीतर रक्षा उपकरणों के डिजाइन, विकास तथा उत्पादन को बढ़ाने पर जोर दे रही है। इस फैसले से घरेलू रक्षा उद्योग के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन और तकनीकी विकास के अवसर खुल सकते हैं।
आयात पर निर्भरता घटाने के लिए लगातार बढ़े कदम
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के हथियारों, सैन्य प्रणालियों, गोला-बारूद तथा महत्वपूर्ण उपप्रणालियों और कलपुर्जों पर चरणबद्ध आयात प्रतिबंध शामिल हैं। इसके साथ घरेलू स्तर पर निर्मित सैन्य उपकरणों की खरीद के लिए अलग बजटीय प्रावधान भी किए गए हैं। रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को 49% से बढ़ाकर 74% किया गया, जिससे विदेशी तकनीक और पूंजी के साथ भारतीय विनिर्माण क्षमता को जोड़ने की कोशिश की गई है। सरकार ने रक्षा क्षेत्र में कारोबार और निवेश को आसान बनाने के लिए प्रक्रियाओं में भी सुधार किए हैं। इन उपायों का उद्देश्य भारत को केवल रक्षा उपकरणों का बड़ा खरीदार बनाए रखने के बजाय एक मजबूत डिजाइन और विनिर्माण केंद्र के रूप में विकसित करना है।
नई मंजूरियां सैन्य आधुनिकीकरण को देंगी गति
रक्षा अधिग्रहण परिषद की ताजा मंजूरियों को व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है। लंबी दूरी की मिसाइल से लेकर रडार, जैमर, हेलीकॉप्टर और विशेष सैन्य वाहनों तक विभिन्न क्षेत्रों में क्षमता बढ़ाने की कोशिश यह दर्शाती है कि आधुनिक युद्ध के लिए बहुस्तरीय तैयारी पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही घरेलू उद्योग से लगभग 98% खरीद का लक्ष्य इस आधुनिकीकरण को आत्मनिर्भरता के साथ जोड़ता है। यदि इन परियोजनाओं को निर्धारित समय और गुणवत्ता मानकों के साथ आगे बढ़ाया जाता है तो इससे सशस्त्र बलों की क्षमता के साथ देश के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को भी लाभ मिल सकता है। आने वाले समय में इन प्रस्तावों की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्वीकृत परियोजनाएं विकास, परीक्षण, उत्पादन और सेनाओं में शामिल किए जाने के चरणों को कितनी तेजी से पूरा करती हैं।