नई दिल्ली : कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के 1983 में भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से तीन साल पहले ही मतदाता सूची में नाम शामिल होने के आरोपों के मामले में एक बड़ा कानूनी मोड़ आया है। दिल्ली की एक अदालत ने सोमवार (21 सितंबर 2026) को इस मामले में दाखिल एक पुनर्विचार याचिका (Revision Plea) को स्वीकार करते हुए मैजिस्ट्रेट कोर्ट के पिछले आदेश को रद्द (Quash) कर दिया है। राउज एवेन्यू कोर्ट स्थित स्पेशल जज विशाल गोगने की अदालत ने 11 सितंबर 2025 के मैजिस्ट्रेट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ जांच की मांग वाली शिकायत को खारिज कर दिया गया था।
स्पेशल जज ने मैजिस्ट्रेट के आदेश को बताया 'बिना कारणों वाला' (Non-Speaking Order)
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मैजिस्ट्रेट कोर्ट का पिछला फैसला कानून के तय मानकों के अनुसार नहीं था।अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा:"आक्षेपित आदेश में कानून की गंभीर त्रुटि है, क्योंकि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) का पालन नहीं किया गया। मैजिस्ट्रेट ने संबंधित पुलिस अधिकारी के तर्कों को नहीं सुना और न ही संबंधित पुलिस स्टेशन से कोई स्टेटस रिपोर्ट (Status Report) तलब की।"
मूल मुद्दे से भटकने का आरोप: नागरिकता नहीं, संज्ञेय अपराध की जांच थी मुख्य विषय
अदालत ने कहा कि मैजिस्ट्रेट ने इस मुख्य पहलू पर विचार करने के बजाय कि शिकायत में कोई संज्ञेय अपराध (Cognisable Offence) प्रकट होता है या नहीं, अपना ध्यान नागरिकता के अधिकार क्षेत्र की ओर मोड़ दिया।विशेष न्यायाधीश ने रेखांकित किया कि मैजिस्ट्रेट के पास दो विकल्प मौजूद थे—या तो वह प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के निर्देश देते या फिर बीएनएसएस (BNSS) के तहत स्वयं कार्यवाही आगे बढ़ाते। हालांकि, मैजिस्ट्रेट ने इन दोनों विकल्पों पर विचार किए बिना ही जल्दबाजी में शिकायत को खारिज कर दिया था।
वकील विकास त्रिपाठी ने दायर की थी याचिका, 1980 के वोटर लिस्ट का मामला
यह पूरा मामला सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन (राउज एवेन्यू कोर्ट) के उपाध्यक्ष और अधिवक्ता विकास त्रिपाठी द्वारा दायर की गई शिकायत से जुड़ा है।
- मुख्य आरोप: याचिकाकर्ता का आरोप है कि सोनिया गांधी को 30 अप्रैल 1983 को भारत की नागरिकता मिली थी। इसके बावजूद, 1980 में नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में उनका नाम धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों के जरिए दर्ज किया गया था।
- लिस्ट में फेरबदल: शिकायत के अनुसार, उनका नाम 1982 में सूची से हटाया गया और फिर अप्रैल 1983 में नागरिकता मिलने के बाद दोबारा जोड़ा गया। याचिका में इस पूरे घटनाक्रम की पुलिस जांच की मांग की गई थी।
नए सिरे से सुनवाई के निर्देश, 29 सितंबर को होगी अगली कार्यवाही
स्पेशल जज विशाल गोगने ने मामले को वापस मैजिस्ट्रेट कोर्ट (ACJM) के पास भेजते हुए (Remand back) निर्देश दिया है कि वह दोनों पक्षों की नई दलीलों और पुलिस की रिपोर्ट को सुनने के बाद एक तर्कसंगत और विस्तृत आदेश (Reasoned Order) पारित करें।अदालत ने स्पष्ट किया है कि पुनरीक्षण अदालत स्वयं मैजिस्ट्रेट की भूमिका में नहीं आ सकती, इसलिए मैजिस्ट्रेट को ही नियमानुसार इस पर विचार करना होगा। इस मामले को आगे की कार्यवाही के लिए 29 सितंबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।