नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस समय देश के सबसे चर्चित और विवादित राजनीतिक चेहरों में से एक बने हुए हैं। नीट (NEET) परीक्षा में धांधली और लगातार प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं के बाद देशभर के लाखों परीक्षार्थी और युवा सड़कों पर उतर आए हैं। प्रख्यात पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन और दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर कोलकाता की सड़कों तक 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) का उग्र प्रदर्शन केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ा रहा है।
आंदोलनकारियों और विपक्षी दलों की एक ही मुख्य मांग है— "धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री के पद से तुरंत इस्तीफा दें।"लेकिन इतिहास का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस 'पेपर लीक' के मुद्दे को लेकर आज धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी पर खतरा मंडरा रहा है, करीब 29 साल पहले इसी 'पेपर लीक' विरोधी आंदोलन ने उनके राजनीतिक करियर की नींव रखी थी
1997 का वह आंदोलन, जिसने धर्मेंद्र प्रधान को बनाया 'नायक'
बात साल 1997 की है। ओडिशा में तत्कालीन मुख्यमंत्री जानकी बल्लभ पटनायक के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी। उस दौरान राज्यस्तरीय एक महत्वपूर्ण परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो गया, जिससे छात्रों में भारी आक्रोश फैल गया।उस समय महज 18-20 वर्ष के छात्र नेता धर्मेंद्र प्रधान, जो उत्कल विश्वविद्यालय में नृविज्ञान (Anthropology) के छात्र थे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े थे, उन्होंने इस आंदोलन की कमान संभाली।
मुख्यमंत्री आवास का घेराव: धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में करीब 1,500 छात्रों ने मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया।
पुलिस की लाठियां और टूटी हड्डियां: प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने शांतिपूर्ण भीड़ पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया। धर्मेंद्र प्रधान के जूनियर रहे प्रशांत राउत याद करते हैं कि उस लाठीचार्ज में धर्मेंद्र प्रधान को गंभीर चोटें आई थीं और उनके शरीर की कई हड्डियां टूट गई थीं।इस साहसिक आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान रातों-रात ओडिशा की छात्र राजनीति के बड़े चेहरे बन गए। ABVP के राष्ट्रीय सचिव (1994) रह चुके प्रधान का राजनीतिक ग्राफ इसके बाद तेजी से ऊपर चढ़ा और उन्होंने ओडिशा में भाजपा की जड़ों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
1997 बनाम 2026: इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
आज 2026 में परिस्थितियां पूरी तरह उलट चुकी हैं। 29 साल पहले जो धर्मेंद्र प्रधान सड़कों पर लाठियां खाकर पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, आज वही देश के शिक्षा मंत्री के रूप में एनटीए (NTA) की नाकामियों और नीट पेपर लीक के आरोपों के कटघरे में खड़े हैं।

दोनों आंदोलनों में कुछ बुनियादी अंतर भी हैं:
पहलू 1997 का ओडिशा आंदोलन वर्तमान नीट (NEET) आंदोलन
दायरा राज्यस्तरीय (ओडिशा) पूरे देश (दिल्ली, कोलकाता, पटना आदि) में व्याप्त
स्वरूप छात्र संगठन (ABVP) द्वारा संचालित गैर-राजनीतिक शुरुआत, CJP और आम छात्रों की भागीदारी
गंभीरता प्रशासनिक विफलता पर विरोध कई छात्रों की आत्महत्या और भविष्य की अनिश्चितता
राजनीतिक असर विपक्ष में रहकर आंदोलन सत्ता में रहते हुए पद से इस्तीफे का दबाव
CJP के आंदोलन में कूदा विपक्ष
दिल्ली से शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह अनोखा और उग्र विरोध प्रदर्शन अब पूरे देश के युवाओं का ध्यान खींच रहा है। इस छात्र आंदोलन को भुनाने के लिए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव समेत पूरा विपक्ष लामबंद हो चुका है।जिस प्रश्नपत्र लीक के विरोध से धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर शुरू हुआ था और वे केंद्रीय मंत्री के पद तक पहुंचे, आज वही प्रश्नपत्र लीक विवाद उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है। अब देखना यह होगा कि जनदबाव के बीच शिक्षा मंत्रालय इस संकट से कैसे निपटता है।